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विशेषज्ञ कप्तान चुनने का वक्त

अजित वाडेकर, पूर्व कप्तान व पूर्व कोच, टीम इंडिया First Published:10-12-2012 07:35:56 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

कुछ समय पहले ब्रिटिश मीडिया में एक खबर छपी थी कि इंग्लैंड ऐंड वेल्स क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट के लिए अलग-अलग कप्तान चुनने का निश्चय किया है। तब यह अनुमान लगाया गया था कि एंड्रयू स्ट्रॉस को एक मौका मिल सकता है। बाकी एलेस्टेयर कुक वनडे व स्टुअर्ट ब्रॉड ट्वंटी-20 टीम के लगभग कप्तान निर्धारित थे। स्ट्रॉस में दमखम बाकी था। इतना दमखम कि तब इंग्लैंड क्रिकेट टीम के डायरेक्टर एंडी फ्लावर ने उनसे एक-दो वर्षों तक खेलने की गुजारिश की थी। परंतु 34 साल के स्ट्रॉस यह जानते थे कि वह 2015 का आईसीसी वल्र्ड कप नहीं खेल पाएंगे, इसलिए उन्होंने एकादश में दूसरे खिलाड़ियों के लिए अपनी जगह खाली कर दी। नतीजतन, कुक टेस्ट व वनडे, दोनों फॉर्मेट के कप्तान बने और उधर ट्वंटी-20 का कमान ब्रॉड को मिला। यह टेस्ट टीम भारत में कितना अच्छा प्रदर्शन कर रही है, यह बताने की जरूरत शायद खेल प्रेमियों को नहीं पड़नी चाहिए। यहीं पर हम ग्राहम गूच की उस टीम को याद कर सकते हैं, जो टेस्ट सीरीज बचाने भारत दौरे पर आई थी और वह भी नहीं बचा पाई।

बहरहाल, आज मेहमान टीम के प्रदर्शन ने यह सवाल उठाया है कि क्या हमें भी तीनों फॉर्मेट के लिए अलग-अलग कप्तान बनाने की जरूरत है? इसे लेकर पूर्व टेस्ट क्रिकेटरों में एकराय नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि कुछ उस दौर के हैं, जब ज्यादा क्रिकेट नहीं खेला जाता था और कुछ हाल ही में रिटायर हुए हैं। लेकिन यह तो सोचना होगा कि टीम इंडिया के हित में क्या है? यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि हां, तीनों फॉर्मेट की प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग कप्तान चुने जाने चाहिए। यही नहीं, कौन खिलाड़ी किस फॉर्मेट में फिट बैठता है, इसका भी खयाल जरूरी है। टीम में अनुभव व प्रतिभा का सामंजस्य हो, नए व पुराने खिलाड़ियों के बीच तालमेल हो, ये सब आवश्यक तत्व हैं, पर प्रदर्शन ही पैमाना हो, इसकी गारंटी भी होनी चाहिए। ये सब नई बातें नहीं हैं। इन्हें मैं तर्को व उदाहरणों से पुष्ट करना चाहूंगा।

सबसे पहले आप देखें कि दुनिया की बेहतरीन टीमों के अलग-अलग फॉर्मेट के अलग-अलग कप्तान हैं। इंग्लैंड तो उदाहरण है ही, ऑस्ट्रेलिया व द. अफ्रीका में भी यही स्थिति है। ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट टीम का कमान माइकल क्लॉर्क संभाल रहे हैं, तो ट्वंटी-20 का जॉर्ज बेली। 2012 की शुरुआत में शेन वॉट्सन वनडे टीम के कप्तान रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका में ग्रीम स्मिथ और ए बी डीविलियर्स को अलग-अलग फॉर्मेट में कप्तान बनाया जाता रहा है। इन टीमों के प्रदर्शन अनुकरणनीय हैं।

दूसरा, इस तरह के बदलाव से टीम पर कोई विशेष दबाव नहीं रहता। टीम नई व उत्साह में रहती है, इसलिए उसमें जीतने की भूख होती है। यह एक मनोवैज्ञानिक बढ़त है। जो खेल अनिश्चितताओं का हो, वहां दबाव होने से परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती हैं। मैं समझता हूं कि टीम इंडिया इसी दबाव में उलझकर अपने लिए विषम परिस्थितियां तैयार कर लेती है। दरअसल, ऑस्ट्रेलिया और कुछ महीने पहले ही इंग्लैंड में भारतीय टीम को मुंह की खानी पड़ी थी। इसके अलावा, इस पूरे दौर में कुछ खिलाड़ी वरिष्ठ की श्रेणी में आ गए, जहां से संन्यास की अटकलें शुरू होती हैं। राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने संन्यास की घोषणा की।

अगर उन्हें आराम देकर उतारा जाता, तो वे कुछ दिन और खेलते। इसी तरह से सचिन तेंदुलकर को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, सचिन तेंदुलकर एक महान खिलाड़ी हैं और यह उन्हें ही सोचना है कि वह कब संन्यास लेंगे। उनके फिटनेस पर सवाल उठ सकता है, पर उनके पैशन पर नहीं। उन पर भरोसा रखें, वह खुद बता देंगे कि वह कब तक खेलना चाहते हैं। एकाएक सहवाग, धौनी जैसे खिलाड़ी, जो कल तक युवा थे, आज वरिष्ठ हो गए हैं। टीम में फेरबदल से नए खिलाड़ियों को मौका भी मिलेगा और पुराने खिलाड़ियों को आराम और फिर दूसरे मैच में खेलने का मौका भी।

तीसरा, जो लोग यह कहते हैं कि जो बेहतर क्रिकेटर हैं, वे सभी फॉर्मेट में बेहतर होंगे, उनसे मैं सहमत हूं, पर आपके सभी फैसले सही हों, यह तो जरूरी नहीं। धौनी बड़े क्रिकेटर हैं। उनकी कप्तानी में हम वनडे और टी-20 के विश्व कप विजेता बने। लेकिन टेस्ट क्रिकेट की विधा इन दोनों से काफी अलग है। वनडे और ट्वंटी-20 फॉर्मेट प्रयोग व जोखिम की मांग करता है। वहीं टेस्ट में चतुराई भरे फैसले लगातार लेने पड़ते हैं। लंबी पारियां खेलनी होती हैं और धैर्य व संयम बनाए रखना पड़ता है। मैदान पर आप गलती न करें और सामने वाला थककर गलती कर बैठे, इसकी व्यूह-रचना करनी होती है। इन सबके लिए कंसिस्टेंसी की जरूरत पड़ती है। बदकिस्मती से धौनी टेस्ट में ऐसा कर पाने में अब तक नाकाम रहे हैं। बीते दो टेस्ट मैचों में हमने देखा कि धौनी ने कई मौकों पर गलत फैसले लिए- टीम इलेवन में खिलाड़ियों के गलत चयन से लेकर गेंदबाजों को आजमाने तक में।

इसलिए धौनी को टेस्ट टीम की कप्तानी से मुक्त कर देना चाहिए। उनकी जगह पर टेस्ट में सहवाग या गौतम गंभीर को जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस दौरान विराट कोहली को भविष्य के कप्तान के तौर पर तैयार किया जा सकता है।
चौथा, कुछ खिलाड़ी मन-मिजाज से किसी एक फॉर्मेट के लिए बने होते हैं। जरूरत पड़ने या अनुभव बढ़ने पर उसे दूसरे फॉर्मेट में मौका दे दिया जाता है, पर उन्हें एक फॉर्मेट का विशेषज्ञ माना जाता है। ज्यादा दूर न जाएं, ऑस्ट्रेलिया के माइकल बेवन को याद करें। भारत में रॉबिन सिंह, अजय जडेजा जैसे खिलाड़ी वनडे के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उसी तरह, हम टेस्ट में लक्ष्मण, द्रविड़, कुंबले को जरूर शामिल करते थे, क्योंकि यहां उनसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता था।

यह परिपाटी अब खत्म हो गई है, इसे फिर से जीवित करना होगा। जैसे पीयूष चावला को इंग्लैंड टेस्ट सीरीज के शुरू के मैचों में मौका नहीं मिला, जबकि वह गेंद को फ्लाइट कराते हैं। टेस्ट मैच में फ्लाइट स्पिन की बड़ी खासियत होती है। रहाणे, रोहित और मनोज तिवारी जैसे खिलाड़ियों को टेस्ट या वनडे का विशेषज्ञ बनाया जाना चाहिए।
पांचवां, टेस्ट मैच में जीत तभी पक्की होती है, जब टीम संतुलित हो, क्योंकि पूरे पांच दिन तक बेहतर प्रदर्शन करना होता है। वनडे की तरह का मामला नहीं होता कि चलो, पिच गेंदबाज के अनुकूल है, तो ज्यादा गेंदबाज टीम में शामिल कर लें और अगर बल्लेबाज के अनुकूल है, तो सात बल्लेबाज को जगह दें।

यहां पहले दिन पिच तेज होती है, तो दूसरे दिन से टूटने लगती है। बहरहाल, हमें इस भ्रम को तोड़ना होगा कि टीम रातोंरात बदल जाएगी या रातोंरात टीम बढ़िया खेलने लगेगी। हौव्वा खड़ा करने का कोई मतलब नहीं है। भविष्य की तीन अलग-अलग टीमें धीरे-धीरे ही बनेंगी। चयनकर्ताओं को घरेलू क्रिकेट पर नजर रखनी होगी, जहां मैं देख रहा हूं कि कई होनहार खिलाड़ी हैं। नए और पुराने खिलाड़ियों से भी सलाह-मशविराकर उन्हें उनकी पसंद के फॉर्मेट में रखा जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया में कप्तानी हस्तांतरण की परंपरा है। बॉर्डर से लेकर क्लॉर्क तक। पहले किसी को वनडे का कप्तान बनाया जाता है। फिर टेस्ट-वनडे दोनों का। और आखिर में सिर्फ टेस्ट की जिम्मेदारी दी जाती है। यहां से वह खिलाड़ी अपने ढलान की ओर बढ़ जाता है। क्या हम इस तरीके को नहीं अपना सकते?
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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