Image Loading हुनूज दिल्ली दूर अस्त, यानी दिल्ली अभी दूर है। - LiveHindustan.com
गुरुवार, 11 फरवरी, 2016 | 03:31 | IST
 |  Image Loading
खास खबरें

हुनूज दिल्ली दूर अस्त, यानी दिल्ली अभी दूर है।

खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार First Published:07-12-2012 07:31:08 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हजरत निजामुद्दीन को दिल्ली का संरक्षक संत कहा जाता है। दिल्ली को बुरी नजर से देखने वालों के लिए उनका संदेश हमारे जेहन में बसा हुआ है, ‘हुनूज दिल्ली दूर अस्त।’ यानी दिल्ली अभी दूर है। हाल ही में एक किताब में उन्हें याद किया गया है।  पेंगुइन-वाइकिंग से आई यह किताब है, मेहरू जफर की द बुक ऑफ निजामुद्दीन औलिया।  इसमें हजरत की जीवनी तो है ही, उनके संदेशों को भी कायदे से शामिल किया गया है। मैं उसमें से कुछ हिस्से साझा करना चाहता हूं।
‘एक दिन राबिया ने पूरे गांव को  बुला लिया, ताकि उनकी खोई हुई सुई ढूंढ़ी जा सके। काफी खोजबीन के बाद पड़ोसियों ने जानना चाहा कि आखिर उनकी सुई किस जगह गायब हुई। राबिया ने कहा, ‘घर के भीतर ही सुई कहीं गुम हो गई।’ एक ने सवाल किया, ‘तब हम उसे घर के बाहर क्यों ढूंढ़ रहे हैं?’ तब राबिया बोलीं, ‘हां, यही तो मैं सोच रही हूं कि हम उसे बाहर क्यों खोज रहे हैं?’ एक शख्स ने कहा, ‘घर के भीतर अंधेरा है। और बाहर कहीं ज्यादा उजाला है।’ ‘शायद’ उन्होंने कहा। फिर एक शख्स बोल पड़ा, ‘तब घर के भीतर को रोशन करना चाहिए। मैं एक चिराग ले आता हूं। हम सुई को भीतर ढूंढ़ सकते हैं।’ इस पर राबिया राजी हो गईं। ‘हां, यह अच्छा है कि भीतर के अंधेरे को रोशन किया जाए और वहीं वह सुई ढूंढ़ी जाए, जहां वह गुम हुई थी।’
‘सूफी फकीरों को संगीत व शायरी से लगाव रहा है। चिश्ती परंपरा को शुरू करने वाले मुईनुद्दीन चिश्ती से उसकी शुरुआत मानी जा सकती है। मुईनुद्दीन तब पचास साल के थे, जब वह समरकंद और बुखारा से हिन्दुस्तान की ओर आए थे। उस जंग और तबाही के आलम में उन्होंने अजमेर को अपना घर बनाया।

अपने बेपनाह प्यार और सहनशक्ति से उन्होंने वहां के लोगों का दिल जीत लिया। उन्हें आज भी गरीब नवाज कहा जाता है। उनके लिए प्यार को जगाने का बेहतरीन जरिया संगीत था। लेकिन संगीत से उनका यह लगाव कई धर्मगुरुओं को नागवार गुजरता था।’
‘दिन भर निजामुद्दीन दूसरों की दिक्कतों को सुनते रहते थे। सुबह वह अपने घर की छत पर लोगों से मिलते थे। उसके बाद दोपहर में हॉल में मिलते थे। बाद में छत पर बने अपने कमरे से यह सिलसिला जारी रखते थे। रात को डिनर तक वह लोगों की परेशानियां दूर करते रहते थे।’
‘अमीर खुसरो उन्हें बहुत मानते थे। साये की तरह उनके साथ रहते थे। हजरत पर उन्होंने अच्छी-खासी शायरी की। एक टुकड़ा आपकी नजर-
अपनी छब बनाएके मैं तो पी के पास गई।
जब छब देखी साजन की अपनी भूल गई।
लखनऊ में पैदा हुई मेहरू जफर फिलहाल वियना यूनिवर्सिटी में इस्लाम पढ़ा रही हैं। इस किताब के अलावा, उन्होंने दो किताबें और लिखी हैं-द बुक ऑफ मोहम्मद और द बुक ऑफ मुईनुद्दीन चिश्ती।  
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
 
 
 
|
 
 
जरूर पढ़ें
कैसा रहा साल 2015
क्रिकेट
क्रिकेट स्कोरबोर्ड