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खोल के भीतर

नीरज कुमार तिवारी First Published:05-12-2012 10:08:10 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

वह तमाम बैठकों में वही कहते हैं, जो उनके बॉस के विचार होते हैं। बॉस बदलने के साथ ही उनके विचार बदल जाते हैं। हालांकि, अपने काम में वह माहिर समझे जाते हैं। बॉस की जरूरत का सौ प्रतिशत देना उनके बाएं हाथ का खेल है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? पामेला मेयर, जो एक सोशल नेटवर्किंग कंपनी की सीईओ और लेखिका हैं, उनका कहना है कि आज की ज्यादातर कंपनियों में मशीनी मानवों का बोलबाला है। वे काम में प्रोफशनली तौर पर रिच हैं, पर विचारों से खाली है। पामेला कहती हैं कि इससे पैसे तो फल रहे हैं, पर विचारों की फसल मार खा रही है। दरअसल, हम इस गफलत के शिकार हैं कि अपने वरिष्ठों की हां में हां मिलाना सही रणनीति है, जबकि यह हमेशा कारगर नहीं होता। किसी भी काम, मुद्दे और समस्या पर जब तक आप अपना दिमाग नहीं लगाते, विचार नहीं रखते आपका अस्तित्व मानव होने के नाते समझ से परे है। 17वीं सदी के महान विचारक बाल्तेशर ग्रेशियन ने कहा था कि आपको यह कोशिश नहीं करनी चाहिए कि आप किसी एक व्यक्ति पर ही निर्भर रहें, बल्कि आपको यह कोशिश करनी चाहिए कि कई व्यक्ति आप पर निर्भर रहें। भला यह हो कैसे? बाल्तेशर के शब्दों में, ‘खुद को सभी वायदों और एहसानों से मुक्त रखें।’ इससे आपकी जवाबदेही कहीं से कम नहीं होती है, बल्कि और बढ़ जाती है। यहां नारायण मूर्ति के विचार प्रासंगिक हैं। वह कहते हैं कि अगर आप मौलिक विचार रखते हैं, तो भले ही वे नहीं माने जाएं, पर आपको वे असम्मानित नहीं बना सकते। उनका कहना है कि आप मशीन से बेहतर हैं और यह बात आपको बार-बार साबित करनी पड़ती है। सच तो यह है कि हम कछुए की तरह कवच चाहते हैं। लेकिन अगर हमें वाकई अपनी स्वतंत्रता, मानसिक सुरक्षा कायम रखनी है, तो अपने विचारों के साथ जीना होगा। खुद को खोल के भीतर रखना अपने को क्षत-विक्षत करने जैसा है।

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