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महिला आरक्षण और दलित राजनीति

बद्री नारायण, प्रोफेसर, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान First Published:02-12-2012 07:14:35 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हर बार यही होता है। संसद का सत्र शुरू होते ही महिला आरक्षण पर चर्चा शुरू हो जाती है। हर बार की तरह इस बार भी इस विधेयक का विरोध दलित व पिछड़ों की राजनीति करने वाले दल कर रहे हैं। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि महिलाओं में, जो पुरुष प्रधान समाज में पिछड़ी हैं, दो वर्ग हैं। एक तो ऊंची जाति की महिलाओं का वर्ग है, और दूसरी श्रेणी पिछड़े व दलित समाज की महिलाओं की है। दलित और पिछड़ी जाति की महिलाएं अभी ज्यादा शिक्षित और मुखर नहीं हैं, अत: महिला आरक्षण का ज्यादा लाभ ऊंची जाति की महिलाओं को मिलेगा। इसके कुछ विरोधी तो यहां तक कहते हैं कि महिला आरक्षण दरअसल प्रतिनिधि सभाओं में ऊंची जातियों का अनुपात बढ़ाने का एक षड्यंत्र है। इसे अगर नजरंदाज भी कर दिया जाए, तब भी यह साफ है कि महिला आरक्षण को लेकर पिछड़े और दलित नेताओं के मन में कई तरह की आशंकाएं हैं।

ठीक यहीं पर यह पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद भारतीय राज्यसत्ता के प्रयासों और दलित आंदोलन की अपनी कोशिशों के कारण जब दलित व पिछड़े वर्गों के पुरुष आरक्षण का लाभ लेने में सफल हैं, तो फिर महिलाएं क्यों नहीं? अगर यह सच है भी, तो क्या इसके लिए दलित व पिछड़े समूह के पुरुषों का अपने समाज की महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण कारण नहीं है? यहां मसला यह है कि दलित आंदोलन ने अपने भीतर महिला प्रश्न के साथ क्या बर्ताव किया है? आधुनिक दलित आंदोलन के लगभग सौ वर्षों के इतिहास में क्या कारण है कि मायावती, मीरा कुमार, शैलजा इत्यादि कुछ नामों को छोड़ दें, तो कोई अन्य महत्वपूर्ण दलित महिला नेता हमें राजनीतिक पटल पर दिखाई नहीं देती? यही हाल पिछड़े वर्गों की राजनीति का है। पिछड़े वर्ग एक शक्तिवान सामाजिक समूह के रूप में आज दिखाई दे रहे हैं, इस समूह ने लोहिया के विचारों से प्रेरणा लेकर अपनी राजनीति विकसित की है। लोहिया हालांकि राजनीति और जीवन के हर क्षेत्र में नारी सहभागिता व नारी स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे, फिर भी हिंदी क्षेत्रों में अगर देखें, तो पिछड़ा राजनीति का कोई चेहरा ‘सही महिला पक्ष’ के रूप में नहीं उभरा।

एक उमा भारती का नाम जरूर लिया जा सकता है, मगर वह भी धीरे-धीरे प्रभावहीन हो गई हैं। दलित राजनीति के आधुनिक अवतार कांशीराम अपने राजनीतिक दर्शन और रणनीति में महिलाओं को बहुत महत्व देते थे। वह चाहते थे कि न केवल ‘मायावती’, बल्कि मायावती की ही तरह भारत के हरेक राज्य में दलित महिलाएं राजनीति में आगे आएं। उन्होंने पार्टी के भीतर तमाम विरोधों के बावजूद मायावती को न केवल राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका दी, बल्कि उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकार भी सौंपा। उनकी राजनीतिक सोच में महिलाएं इतनी महत्वपूर्ण थीं कि कई बार वह दलित व सवर्ण महिलाओं का भेद भुलाकर अगर कोई महिला उन्हें राजनीति में क्षमता से भरी दिखती, तो उसकी तारीफ करते थे। बसपा के निर्माण और प्रसार के आरंभिक दौर में, जब पीवी नरसिंह राव के हाथों में कांग्रेस की बागडोर थी और सोनिया गांधी राजनीति में अपनी बहुत थोड़ी मौजूदगी रखती थीं, तब कांशीराम मानते थे कि नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस से निपटाना आसान है, किंतु सोनिया गांधी ने अगर कांग्रेस का नेतृत्व संभाल लिया, तो फिर कांग्रेस से निपटना कठिन होगा।

वह मानते थे कि सोनिया में बहुत क्षमताएं हैं। कांशीराम फूलन देवी से भी बहुत प्रभावित थे। वह मानते थे कि इस महिला ने रोज-रोज उत्पीड़न झेलने वाली दलित महिलाओं को राह दिखाई है। कांशीराम कहते थे कि हर दलित महिला को फूलन देवी की प्रतिरोध शक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिए। फूलन देवी की इसी नारी शक्ति को नमन करते हुए कांशीराम ने दलितों, बामसेफ के कार्यकर्ताओं और अपने साथियों से आग्रह किया था कि 1981 को फूलन देवी के वर्ष के रूप में हम मनाएं।

कांशीराम पर लिखे गए अनेक संस्मरणों से यह जाहिर होता है कि महिलाओं का दुख उन्हें बहुत दुखी करता था। वह अनेक बार दलित महिलाओं पर होने वाले दमन और उत्पीड़न की घटना सुनकर रोने लगते थे। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो कांशीराम अपने बामसेफ, डीएस फोर और बसपा के आयोजनों में महिलाओं की भागीदारी देख बहुत खुश होते थे, उनकी पार्टी में मायावती के बाद कोई दूसरी महिला नेता दिखाई नहीं पड़ती। यह जानना और दुखद है कि बसपा वॉलेंटरी फोर्स की कुछ महिलाओं को छोड़कर बसपा का अपना कोई महिला जन संगठन नहीं है।

दक्षिण भारत के सवर्ण विरोधी आंदोलनों और महात्मा फूले, अंबेडकर के अथक प्रयासों से यह तो हुआ कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में दलित महिलाएं पढ़ने-लिखने के लिए और उत्तर भारत के मुकाबले ज्यादा तादाद में नौकरी में आने लगीं, किंतु उनका राजनीतिकरण नहीं हो पाया। दलित घरों में अन्य ऊंची जातियों की तरह ही महिलाओं के साथ व्यवहार होता रहा। जैसे-जैसे दलित व पिछड़े समूह मध्य वर्ग व उच्च  मध्य वर्ग में तब्दील होते गए, उन्होंने खुद अन्य ऊंची जाति की महिलाओं जैसी जीवन शैली को अपना मानक मान लिया। उनके साथ दलित पुरुष का व्यवहार लगभग वैसा ही है, जैसा सवर्ण और ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े घरों में होता है। भारतीय परिवार की मूल्य व्यवस्था के आदर्श बहुत कुछ ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक मूल्यों से बने हैं। भारतीय परिवार व्यवस्था की गैर ब्राह्मणवादी वैकल्पिक मूल्य व्यवस्था का विकास होना अभी बाकी है।

परिवार के संदर्भ में ही नहीं, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में भी दलित व पिछड़े समूहों के वैकल्पिक प्रयासों का ढांचा बहुत कुछ ब्राह्मणवादी मूल्य व्यवस्था जैसा दिखाई देता है। इलाहाबाद में दलित महिलाओं की एक ऐसी ही सभा में शामिल दलित पुरुष दलित महिलाओं के तीखे प्रश्नों का जवाब नहीं दे पा रहे थे। उन दलित महिलाओं का तर्क था कि जो दलित हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना रहे हैं, वे बौद्ध धर्म का जो ढांचा विकसित कर रहे हैं, उसमें भी स्त्री के साथ दोयम दर्जे के नागरिक-सा व्यवहार किया जाता है। वहां कर्मकांडों का वही बोझ उन पर लादा जाता है, जो ब्राह्मणवादी धर्म व्यवस्था में दिखाई पड़ता है।

महिला आरक्षण के विरोध की राजनीति उनकी मजबूरी हो सकती है, लेकिन दलित व पिछड़े नेतृत्व को अंतत: यह सोचना ही होगा कि अपने घरों में और घर से बाहर महिलाओं की भागीदारी किस प्रकार बढ़ाई जाए। यदि ऐसा होता है, तो दलितों व पिछड़ों की राजनीति का ज्यादा प्रगतिशील चेहरा सामने आएगा, जो उनके सामाजिक विकास का रास्ता तैयार करेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
 
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