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उलझे हुए कानून का डरावना इस्तेमाल

पवन दुग्गल, साइबर कानून विशेषज्ञ First Published:02-12-2012 07:13:47 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

साइबर कानून से संबद्ध भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 की धारा-66 ए को लेकर विवाद हो रहे हैं। जैसे, प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र मामले में। अंबिकेश महापात्र की गिरफ्तारी हुई, क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर कार्टून साझा किया था। रवि श्रीनिवासन ट्विटर केस में यह बात सामने आई कि कैसे किसी व्यक्ति के ट्वीट करने के मामले को धारा-66 ए की सीमा में लाया जा सकता है। केवी राव मामले में, तो मुंबई के केवी राव व मयंक की गिरफ्तारी इस आरोप के तहत हुई कि कि उन्होंने फेसबुक पर नेताओं पर अपमानजनक टिप्पणियां कीं। ताजा केस मुंबई का है, जिसमें दो लड़कियों में एक को फेसबुक पर टिप्पणी पोस्ट करने और दूसरे को उसे लाइक करने के आरोप में पकड़ा गया। ऐसे में, इस कानून पर बहस छिड़ गई है।

धारा-66 ए के मुताबिक, अगर आपने कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के माध्यम से कोई ऐसी जानकारी भेजी हो, जो अपमानजनक हो, चरित्र-हनन करती हो, उससे किसी की मान-हानि हो, जो गलत हो और पीड़ा पहुंचाने के वास्ते हो, या असुविधाजनक या खौफ पैदा करने वाली हो, तो आप पर मामला बनता है। इसके अलावा, पोस्ट की गई जानकारी झूठी और मुश्किलें बढ़ाने वाली हों या तौहीन करने वाली हो, अगर उस जानकारी में आपराधिक वारदात की धमकी हो, तो वह भी इस धारा के तहत कानून का उल्लंघन है। शत्रुता, घृणा, उन्माद, हिंसा पैदा करने वाली टिप्पणियां भी इसी दायरे में हैं। अगर आप सोशल मीडिया के यूजर हैं, या कंप्यूटर सिस्टम या मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, तो सतर्क रहें। आप आईटी एक्ट-2000 की धारा-66 ए के दायरे में हैं।

इस धारा के तहत इस्तेमाल भाषा और कानूनी शब्दों के क्षेत्र काफी विस्तृत हैं और इसकी विभिन्न व्याख्याएं मुमकिन हैं। दिक्कत यह है कि अलग-अलग और व्यापक मापदंडों में इसका इस्तेमाल होता है, जिनकी कानून ने कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं दी हैं। अब इन मापदंडों को कानून लागू करने वाली एजेंसियां जैसे चाहे, वैसे अर्थ निकाल सकती हैं। यह धारा अपमानजनक व चरित्र-हनन करने वाले व्यवहार के लिए है। पर वह यह नहीं बताती कि क्या अपमानजनक है व क्या चरित्र-हनन? संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी पर जो मुनासिब पाबंदी की बात है, यह धारा उससे काफी दूर चली जाती है। किसी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी पर मुनासिब पाबंदी के अर्थों को स्पष्ट करना जरूरी है। संशोधित आईटी एक्ट-2000 की धारा-66 ए के पास मोबाइल व डिजिटल तंत्र पर अभिव्यक्ति की आजादी को न्यायपूर्ण तरीके से प्रभावित करने की क्षमता है। पर इसके लिए संशोधन जरूरी है, ताकि ठोस साइबर कानून बने, जिसमें भारतीय संविधान की आत्मा भी हो और साथ ही आज हमें जो सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं उनके हालात की समझ हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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