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महान पिता और उनकी पुत्रियां

रामचन्द्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार First Published:30-11-2012 07:12:32 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

अपने भारत दौरे में एक भाषण के दौरान आंग सान सू की से पूछा गया कि बर्मा की फौज के बारे में उनके क्या विचार हैं? उन्होंने कहा कि वे फौजी शासन के खिलाफ हैं फौजियों की निरंकुशता के भी खिलाफ हैं लेकिन फौज के खिलाफ नहीं हैं। वे फौज के खिलाफ कैसे हो सकती हैं जबकि बर्मा की फौज के संस्थापक उनके पिता आंग सान थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि फौज उनके पिता कि बताई हुई मर्यादाओं में लौट जाएगी और देश के लिए काम करेगी, जनता के खिलाफ नहीं।

सू की से उनके पिता की तारीफ सुनकर मुझे एक सुबह याद आई जो मैंने नई दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास के प्रतीक्षा कक्ष में बिताई थी। यह 1989 का जनवरी महीना था। एक दशक से ज्यादा फौजी शासन के बाद पाकिस्तान में चुनाव हुए थे और बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री चुनी गईं थी। मुझे पता था कि मुझे अपने वीजा इंटरव्यू के लिए एक घंटे से भी ज्यादा इंतजार करना पड़ेगा इसलिए मैं एक किताब साथ ले गया था। लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने वह किताब दरवाजे पर ही रखवा ली थी। ऐसे में इंतजार करते हुए मुझे वहीं आसपास पड़ी हुई छपी हुई सामग्री का सहारा था। वहां उर्दू की कुछ पत्रिकाएं और अंग्रेजी के पर्चे पड़े हुए थे।

वे सारे देश की नई प्रधानमंत्री के भाषणों के पर्चे थे। उन्हें सत्ता में आए मुश्किल से दो साल हुए थे लेकिन यहां वहां ढेर सारे भाषण दे डाले थे। मुझे याद है कि उनमें से एक भाषण रावलपिंडी गोल्फ क्लब में हुआ था जहां श्रोताओं में सिर्फ फौजी थे। अपने हर भाषण में बेनजीर ने ज्यादातर अपने पिता के बारे में बोला था कि कैसे वे एक लोकतांत्रिक और मजबूत पाकिस्तान बनाना चाहते थे और कैसे वे उनके इस सपने को पूरा करने वाली हैं। उनके पिता ने उनका राजनैतिक प्रशिक्षण बहुत जल्दी ही शुरू कर दिया था जब वे 17 साल की उम्र में अपने पिता के साथ शिमला समझौते के वक्त आईं थीं। उन्होंने बेनजीर को ऑक्सफोर्ड छात्र संगठन अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था।

वे चाहते थे कि उनकी बेटी उनकी राजनैतिक उत्तराधिकारी बने। भुट्टो 1971 में प्रधानमंत्री चुने गए तो उन्हें उम्मीद थी कि वे कई दशकों तक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। लेकिन 1977 में उन्हें फौजी बगावत के जरिये कुर्सी से उतार दिया गया और 1979 में फांसी पर लटका दिया गया। दस साल बाद जब आखिरकार उनकी बेटी प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने अपने पिता का महिमामंडन करने में कोई वक्त नहीं लगाया। अपने पिता के प्रति उनका प्रेम और उत्साह इतना था कि दो ही महीने में पाकिस्तानी दूतावासों में ऐसे पर्चो के ढेर लग गए जिनमें जुल्फीकार अली भुट्टो को मोहम्मद अली जिन्ना के बाद महानतम पाकिस्तानी नेता बताया गया था।

जुल्फीकार अली भुट्टो के कुछ गड़बड़ कामों में एक 1970-71 में पूर्वी बंगाल में पाकिस्तानी फौजों द्वारा किए गए अत्याचारों का समर्थन था। इसका जिक्र बेनजीर अपने भाषणों में नहीं करती थी। बांग्लादेश के युद्ध में भुट्टो और जनरल याहया खान एकतरफ थे और शेख मुजीबुर रहमान दूसरी तरफ। यह भी एक विरोधाभास है कि बाद में मुजीब की बेटी शेख हसीना एक किस्म से बांग्लादेशी बेनजीर भुट्टो बन गई। बेनजीर की ही तरह शेख हसीना ने भी छात्र राजनीति में हिस्सा लिया था। जब उनके पिता-मां और तीन भाईयों का 1975 में कत्ल कर दिया गया तब शेख हसीना जर्मनी के दौरे पर थीं इसीलिए बच गईं।

भुट्टो की ही तरह मुजीब को मारने वाले लोग भी फौजी अफसर थे। शेख हसीना को जान का खतरा था इसलिए वे विदेशों में ही रही और 1981 में ही बांग्लादेश लौटी। तब उन्होंने अपने पिता की अवामी लीग की सदारत अपने हाथों में ली। 15 साल तक वे और उनकी पार्टी विपक्ष में रहे जबकि फौजी या फौजियों से समर्थित राजनेता सत्ता में रहे। 1996 में वे आखिरकार प्रधानमंत्री बनी। वे सिर्फ पांच साल प्रधानमंत्री रह पाई और उन्हें चुनाव में बेगम खालिदा जिया ने हरा दिया जो एक पूर्व राष्ट्रपति की पत्नी थी जिन्हें कत्ल कर दिया गया था। 2008 में शेख हसीना फिर सत्ता में आई और बेनजीर की ही तरह उन्होंने भी फौज को किनारे रखना चाहा और अपने शहीद पिता के महिमामंडन में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बेनजीर और शेख हसीना अपने-अपने देश में सरकार संभालने वाली पहली महिलाएं थीं। उनके पहले भारत में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं और उनके भी पहले सिरीमाओ भंडारनायके श्रीलंका की प्रधानमंत्री बनी थी। सितम्बर 1959 में श्रीमाओ के पति तत्कालीन प्रधानमंत्री आरडी भंडारनायके का कत्ल कर दिया गया। जब कुछ महीनों बाद सरकार गिर गई तब अराजनैतिक सिरीमाओ को श्रीलंका फ्रीडम पार्टी को एकजुट रखने के लिए राजनीति में आना पड़ा। जुलाई 1960 में सिरीमाओ के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीता और सिरीमाओ पहली बार प्रधानमंत्री बनी।

सिरीमाओ की तरह ही सोनिया गांधी का किस्सा है। अगर उनके पति की हत्या नहीं होती तो सोनिया भी राजनीति में नहीं आती। राजनीति से उनका अलगाव इतना था कि कांग्रेस पार्टी की सात साल की कोशिशों के बाद ही वे राजनीति में आईं। लेकिन जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बनी तो वे पूरी तरह अपने काम में जुट गई। हालांकि 2004 में वे प्रधानमंत्री नहीं बनी तब भी सत्तारूढ़ गठबंधन की नेता दरअसल वही हैं।

यह एक अनोखी और ध्यान खींचने वाली दक्षिण एशियाई घटना है। सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर यहां महिलाएं अपने पतियों या पिताओं की आतंकवादियों या फौजियों द्वारा हत्या के बाद आई हैं। इसके बावजूद सू की कहानी कई वजहों से सबसे अलग हैं। उनके पिता जुलाई 1947 में मारे गए थे जबकि उनकी बेटी पूरे 40 वर्षों बाद राजनीति में आई। वे अपनी बीमार मां को देखने अपने देश गई थीं और तभी फौजी शासन के खिलाफ एक जनविद्रोह भड़क उठा था और वे उसमें शामिल हो गईं।

सू की ने राजनीति ऊपर से नहीं नीचे से शुरू की है। उन्होंने राजनीति में ज्यादातर वक्त जेल में या नजरबंदी में बिताया। दूसरी ओर सिरीमाओ बेनजीर, हसीना, खालिदा और सोनिया को बना-बनाया और समृद्ध पार्टी संगठन मिला था, जिसने उन्हें सत्ता की शीर्ष पर पहुंचाया। 1988 में वे राजनीति में आई थीं। 24 साल बाद वे सिर्फ सांसद हैं।

सू की का रास्ता बहुत कठिन रहा है। उनके कष्टों ने और विपक्ष में बिताए दिनों ने उन्हें शारीरिक और नैतिक बल दिया है। उन्हें सत्ता तश्तरी में नहीं मिली है। अगर वे प्रधानमंत्री बनती हैं तो इसलिए नहीं कि आंग सान की बेटी हैं बल्कि वे लोकतंत्र के लिए बर्मा के जनसंघर्ष की प्रतीक, एकता बिन्दु और मुख्य नेता एक साथ हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
 
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