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सोच को हल्का सा मोड़ दें

राजीव कटारा First Published:30-11-2012 07:09:57 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

ये क्या हो रहा है? वह परेशान हो रहे हैं। उनका सोचा-समझा सब उलट गया है। सभी संगी-साथी धीरे-धीरे कटने लगे हैं। एक हताशा उन्हें घेरने लगी है। ‘हम जब परेशानी में होते हैं, तो यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि इस खराब में भी अच्छा क्या निकल रहा है? यहीं से चीजें बदल जाती हैं।’ यह मानना है जेफ वाइज का। वह मशहूर लेखक हैं। मनोविज्ञान पर उनकी किताब ऐक्सट्रीम फियर: द साइंस ऑफ योर माइंड इन डैंजर खासा चर्चित हुई है। अक्सर हम एक सीधी लकीर पर सोचते हैं। उसे लेकर ही उम्मीदों-अरमानों में जीने लगते हैं। दिक्कत तब आती है, जब वह लकीर टेढ़ी पड़ जाती है। जाहिर है हम परेशान हो जाते हैं। लेकिन परेशान होने से तो कोई रास्ता निकलता नहीं है। और रास्ता निकाले बिना बात बनती नहीं।

दरअसल, टेढ़ी हो गई लकीर को सीधा करने के लिए अपनी सोच पर काम करना होता है। अपनी सोच को हल्का सा मोड़ देने की जरूरत होती है। और थोड़ी सी सोच को मोड़ते ही सब कुछ बदल जाता है। हमारी जिंदगी में आने वाली हर परेशानी हमें कुछ न कुछ सिखा कर ही जाती है। वह एक नया अनुभव दे कर जाती है। हम कुछ हों या न हों, लेकिन वह हमें थोड़ा सा समझदार बना कर तो जाती ही है। एक बड़ी समझ वह यह दे कर जाती है कि हमें चीजों को महज एक ही कोण से नहीं देखना चाहिए। उसे देखने के और भी कोण होते हैं। बस वह कोण हमें दिखलाई नहीं पड़ता। परेशानी में जब हमें छटपटाहट होती है, तो हम इधर उधर हाथ मारते हैं। और उसीमें कोई कोण भी निकाल ही लेते हैं। एक खराब दौर से निकलने के बाद अक्सर हम महसूस करते हैं कि कुछ तो अच्छा उसमें से भी निकला ही है। अगले खराब दौर का यही संबल बनता है।          

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