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सम्मान की लड़ाई और लड़ाकों का कंफर्ट जोन

नीरज बधवार First Published:29-11-2012 10:41:56 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

‘अहं’ आहत होने पर इंसान सम्मान की लड़ाई लड़ता है। वजूद को बचाए रखने के लिए लड़ाई जरूरी है, इसलिए लड़ने से पहले बहुत सावधानी से इस बात का चयन कर लें कि आपको किस बात पर ‘अहं’ आहत करवाना है।

दुनिया अगर इस बात के लिए भारत को लानत भेजती है कि सवा अरब की आबादी में एक भी शख्स ऐसा नहीं, जो सौ मील प्रति घंटा की रफ्तार से गेंद फेंक पाए, तो आपको यह सुनकर हर्ट नहीं होना है। भले आप मोहल्ले के ब्रेट ली क्यों न कहलाते हों। सम्मान की लड़ाई आपको यह सुविधा देती है कि दुश्मन भी आप चुनें और रणक्षेत्र भी। इसलिए जिस गली में आप क्रिकेट खेलते हैं, उसे रणक्षेत्र मानें और जिस मरियल से लड़के से आपको बेबात की चिढ़ है, उससे कहिए, तेरे को तो मैं बताऊंगा, तू जरा बैटिंग करने अइयो!

यह ऐसा नुस्खा है, जिसे आप कहीं भी लागू कर कुछ ढंग का न कर पाने के व्यर्थता बोध से मुक्त हो सकते हैं। मसलन, आपकी बिरादरी का कोई भी लड़का अगर आठ-दस कोशिशों के बाद भी दसवीं पास नहीं कर पा रहा, आपके समाज में बच्चों के दूध के दांत भी तंबाकू खाने से खराब हो जाते हैं, तो इन सबसे आपके माथे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। पढ़ने के लिए, कुछ रचनात्मक करने के लिए आपको दुनिया से लोहा लेना होगा और यह आपसे नहीं होगा, आप तो पूरी जिंदगी पार्क की बेंच का लोहा बेचकर दारू पीते रहे हैं।

दुश्मन के इलाके में जाकर हाथ-पांव तुड़वाने से अच्छा है कि अपने ही इलाके में दुश्मन तलाशिए। ऐसे में, औरत और प्रेमियों से आसान शिकार भला और कौन होगा? आप कह दीजिए.. आज से लड़कियां मोबाइल इस्तेमाल नहीं करेंगी, जिन्स नहीं पहनेंगी। लड़के-लड़कियां प्यार नहीं करेंगे। फरमान सुनाते जाइए और धमकी भी दे दीजिए कि किसी ने अगर ऐसा किया, तो फिर देख लेंगे। इन फरमानों को अपने ‘अहं’ से जोड़ लीजिए। औरत जात आपसे लड़ नहीं सकती। दो लोग पूरे समाज से भिड़ नहीं सकते। ऐसा करते जाइए, क्योंकि सम्मान की लड़ाई का इससे बेहतर कम्फर्ट जोन आपको कहीं और नहीं मिलेगा।

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