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आयोडीन नमक पर रुक गई स्वास्थ्य सेवा

पंकज चतुर्वेदी, स्वतंत्र पत्रकार First Published:28-11-2012 10:04:38 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

कुछ भयानक रोगों को हमने नजरंदाज कर दिया है। ऐसा ही एक रोग है घेंघा या ग्वाइटर। इसके शिकार रोगी के गले में थैली की तरह मांस लटक आता है। गरीबी, कुपोषण जैसी कई चीजें इस रोग की मुख्य वजहें हैं। सरकार आयोडीन युक्त नमक की व्यवस्था कर समझ रही है कि उसका कर्तव्य पूरा हो गया। जबकि हकीकत यह है कि आयोडीन युक्त नमक के बावजूद घेंघा रोग महामारी का रूप लेता जा रहा है। पहले हिमाचल, हिमालय की तराई, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, मणिपुर और नगालैंड को ही घेंघा-ग्रस्त इलाका माना जाता था। अब मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और तो और राजधानी दिल्ली में भी इसके रोगियों की संख्या अप्रत्याशित ढं़ग से बढ़ रही है।

हमारे गले की थायराइड ग्रंथि का वजन महज 25 ग्राम होता है। लेकिन इसके ऊतकों (टीशू) के फूल जाने पर इसका वजन 200 से 500 ग्राम तक हो जाता है, यही घेंघा की अवस्था होती है। इस रोग का एक मूल कारण शरीर में आयोडीन की कमी है। शरीर के लिए अत्यावश्यक हारमोन्स ‘थायरोक्सीन’ के निर्माण में आयोडीन की बेहद जरूरत होती है। ‘थायरोक्सीन’ थायराइड ग्रंथि से प्राप्त होता है। यह शरीर की कई क्रियाओं जैसे, रक्तचाप, जल, खनिज लवणों की मात्र में सामंजस्य आदि पर नियंत्रण रखता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन लगभग 200 माइक्रोग्राम आयोडीन की जरूरत पड़ती है, जिसका तीन-चौथाई भाग थायराइड में थायरोक्सीन निर्माण में खर्च हो जाता है। जब शरीर को लगातार आयोडीन नहीं मिलता, तो थायरोक्सीन का निर्माण रुक जाता है।

यह माना जाता है कि अगर भूमि में आयोडीन की कमी होगी, तो उसमें पैदा होने वाले खाद्य-पदार्थों में भी इसकी अल्पता रहेगी। इस कमी को पूरा करने के लिए आयोडीन-युक्त नमक प्रयोग में लाया जाता है। दिक्कत यह है कि कई ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जो आयोडीन के असर को कम कर देते हैं। जैसे फूलगोभी, पत्तागोभी, शलजम और सरसों। डेयरी के दूध में प्रिजरवेटिव के रूप में प्रयुक्त ‘थायोसाइनेट्स’ के अधिक सेवन से भी घेंघा हो जाता है। हालांकि साधारण दूध में यह प्रति लीटर 10 से 20 मिलीग्राम प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहता है। कुछ साल पहले दिल्ली में स्कूली बच्चों के बीच किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि साधारण स्कूलों की अपेक्षा अमीर स्कूल के बच्चों में घेंघा रोग के लक्षण अधिक थे। यानी जो अधिक दूध पीते हैं, वे इसके ज्यादा शिकार हुए। कह सकते हैं कि गरीबों का रोग अब समृद्ध लोगों को भी शिकार बना रहा है।

शरीर में आयोडीन की कमी को पूरा करने लिए किए जा रहे बाहरी प्रयास असफल रहे हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि प्रकृति में हो रहे आयोडीन के ह्रास को रोका जाए। जल, जंगल, जमीन में इस तत्व की कमी के कारणों और भारत के स्थानीय परिवेश में इस रोग की वजहों की खोज जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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