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बात एक पत्र की

नीरज कुमार तिवारी First Published:28-11-2012 10:03:25 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

दादाजी की आंखों में आंसू थे। उस पोते ने आखिर उन्हें एक पत्र लिखा था, जो पत्र लिखने की उनकी आदत का मजाक उड़ाया करता था। आश्चर्य इस बात को लेकर भी था कि यह पत्र उस युवा का था, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था।

थिंकर और परफॉर्मर गैरिसन कीलर ने एक बेहतरीन किताब लिखी है- लिविंग होम। किताब में वह लिखते हैं कि पत्र लिखना इस दुनिया का सरलतम काम है, जो लुप्त हो रहा है। वह कहते हैं- पत्र जैसा कोई उपहार नहीं, इसे देने पर विचार मत कीजिए, बस दीजिए। गैरिसन कहते हैं कि किसी भी पत्र को लिखते समय व्याकरण व शैली की बात सोचना फिजूल है। आप बस अपने समाचार देते जाइए। आप कहां गए, किस-किस से मिले, उन्होंने क्या कहा, आप क्या सोचते हैं? इससे न केवल आप धन्य होंगे, बल्कि पत्र पाने वाला भी। पत्र हमें एक भावनात्मक सूत्र में बंधे होने का एहसास कराते हैं। अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार लॉर्ड बायरन ने पत्र को एकांत का साथी कहा है। उन्होंने कहा था कि अगर तुम एकांत के सबसे अच्छे मित्र की तलाश में हो, तो पत्र लिखो। यह जीवन की धूप-छांव में सबसे ईमानदारी भरा पल होगा, जो तुम्हें अपने सबसे करीब ले पाएगा। बायरन मानते थे कि पत्र लेखन एक प्रकार का चिंतन है, जो मस्तिष्क को स्थिरता देता है। पत्र लिखना जितना मायने रखता है, उतना ही उसे पढ़ना भी। दुनिया के किसी खामोश कोने में बैठकर दूसरे कोने में बैठे किसी अनाम साथी से संवाद, ऊष्मा से ज्यादा उत्तेजना का सबब हो जाता है। यह एकालाप नहीं, बल्कि अकेलेपन से जोड़ने और अपनी संवेदनाओं को मजबूत करने का जरिया है। पत्र को लेकर आज भी लोग गंभीर हैं। दिलीप कुमार ने ब्लैक फिल्म देखने के बाद अमिताभ बच्चान को बधाई का पत्र लिखा। अमिताभ ने यह पत्र ड्रॉइंग रूम में सजा दिया है। क्या पत्रों को हम ऐसी अहमियत देते हैं?

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