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मंगल पर बनेगा अपना घर!

सत्य सिंधु First Published:27-11-2012 12:41:47 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
मंगल पर बनेगा अपना घर!

मंगल के बारे में तो तुम जानते ही हो कि यह हमारा करीबी ग्रह है और हमारी पृथ्वी से काफी मिलता-जुलता भी। फिर भी तुम्हारे मन में सवाल होगा कि क्या हम वहां अपना घर बना पाएंगे। तो अब तुम मंगल पर जाने की भी उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि नासा की मार्स साइंस लेबोरेटरी क्यूरियोसिटी रोवर तीन महीने में ही काफी जानकारियां भेज चुका है। पूरी जानकारी दे रहे हैं सत्य सिंधु

मंगल हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचता रहा है। कई मायनों में हमारी पृथ्वी जैसा होने और पड़ोसी ग्रह होने के कारण हम एक आस भी लगा बैठे थे कि शायद हम यहां रह पाएं। तुम्हें जानकर खुशी होगी कि इस दिशा में काफी सफलता भी मिल रही है। नासा ने इस आस के पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। नासा की मार्स साइंस लेबोरेटरी ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ द्वारा भेजी जा रही जानकारियां वैज्ञानिकों को तो खूब उत्साहित कर रही हैं।
क्यूरियोसिटी रोवर एक मोबाइल रोबोट है, जिसे नासा ने मंगल पर कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब तलाशने को भेजा है। इस आधार पर नासा तय करेगा कि इंसान कब मंगल पर घर बनाने का सपना साकार कर पाएगा। नासा का यान पिछले वर्ष 26 नवम्बर को रोवर को लेकर मंगल की यात्रा पर निकला और लगभग साढ़े आठ महीने बाद इसी वर्ष 5 अगस्त को सुबह 10 बजकर 31 मिनट पर वहां पहुंचा था। स्पोर्ट्स कार के आकार का रोवर मंगल पर उतरते ही अपने काम में जुट गया।

लगभग 900 किलोग्राम का यह रोबोट बहुत ही ताकतवर है। मंगल के वातावरण और उसकी जमीन की जांच के लिए इसमें 17 कैमरे लगे हैं। पत्थरों को तोड़ने के लिए इसके पास एक शक्तिशाली लेजर भी है। मंगल के रेडिएशन को जांचने-परखने के लिए मशीनें हैं और पानी खोजने के लिए सेंसर है। मिट्टी जमा करने के लिए भी इसके पास खास उपकरण है और वायुमंडल व भूगर्भ की जानकारी के लिए इस रोबोट के पास चार स्पेक्टोमीटर हैं। मौसम की जानकारी तो इसे भी रखनी होगी, इसलिए वैज्ञानिकों ने इस रोबोट में कैब नाम का एनवायरमेंट सेंसर लगा दिया है। दो साल के दौरान इस रोबोट को लगभग 20 किलोमीटर दूरी तय करके ढेर सारी जानकारियां और तस्वीरें भेजनी हैं। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि वहां कौन-कौन से खनिज पदार्थ हैं, पहाड़ों-पठारों का निर्माण कैसे हुआ, मौसम परिवर्तन का इतिहास क्या है, वहां रेडिएशन कहां और किस-किस तरह का है और पानी तथा कार्बन डाई ऑक्साइड की स्थिति क्या है। आमतौर पर हम अपनी पृथ्वी से दूसरे ग्रहों की दूरी को प्रकाश वर्ष में नापते हैं, लेकिन पृथ्वी और मंगल के बीच की दूरी को वैज्ञानिक ज्यादातर किलोमीटर में लिख रहे हैं। वैसे तो मंगल एक बार पृथ्वी के करीब आ जाता है और एक बार काफी दूर चला जाता है, लेकिन जब मंगल हमारे करीब होता है तो इन दोनों ग्रहों के बीच की दूरी लगभग 5 करोड़ 60 लाख किलोमीटर होती है। जब क्यूरियोसिटी मंगल पर उतरा, उस समय इन दोनों ग्रहों के बीच की दूरी लगभग 5 करोड़ 70 लाख किलोमीटर थी। यह रोबोट लगभग 21 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से मंगल पर 253 दिनों में पहुंचा था। लेकिन 10 वर्ष में तैयार इस रोबोट ने 14 मिनट में ही पृथ्वी पर सूचना पहुंचाना शुरू कर दिया। आखिर मंगल से पृथ्वी तक सिगनल पहुंचने में 14 मिनट जो लगते हैं। 1965 से पहले तक माना जाता था कि मंगल पर जल तरल रूप में मौजूद होगा, लेकिन 1965 में ही जब मेरिनर 4 यहां पहुंचा था तो स्पष्ट हो गया था कि यहां पानी बर्फ के रूप में तो है लेकिन तरल रूप में नहीं है।

हमारी पृथ्वी सूर्य से तीसरे स्थान पर है और मंगल चौथे स्थान पर। यह लगभग 22 करोड़ 79 लाख किलोमीटर की दूरी पर सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। सूर्य की एक परिक्रमा में जहां हमारी पृथ्वी को 365 दिन लगते हैं, वहीं मंगल को 687 दिन लगते हैं। हमारा दिन-रात 24 घंटे का होता है, लेकिन मंगल का दिन-रात 24 घंटे 39 मिनट का होता है। इस लाल ग्रह का व्यास पृथ्वी के व्यास से आधा है। जब यह सूर्य के करीब होता है तो अधिकतम तापमान 27 डिग्री रहता है, जाड़े में तापमान शून्य से 140 डिग्री तक नीचे चला जाता है। 5 अगस्त को क्यूरियोसिटी जहां उतरा था, वहां से यात्रा करते हुए 18 नवम्बर को पूरब की ओर 83 फिट की यात्रा कर चुका था। इसके गए अभी लगभग साढ़े तीन महीने ही हुए हैं, लेकिन इसकी सूचनाओं से वैज्ञानिकों का उत्साह और उम्मीद काफी बढ़ रही है। वर्ष 2007 तक वैज्ञानिक यह लक्ष्य लगा रहे थे कि 2037 तक मानव को वहां रखना है, लेकिन क्यूरियोसिटी की उत्साहजनक सूचनाओं से उन्हें विश्वास होने लगा है कि मानव पहले ही इस ग्रह पर पहुंच सकता है। हो सकता है यह लक्ष्य 2025 तक ही पूरा हो जाए। अगर ऐसा हो गया तो तुम भी लगभग आठ महीने में वहां पहुंच सकते हो। हो सकता है तब तक स्पेस सूट भी तैयार हो जाए, जिसे पहनकर तुम मम्मी-पापा और दोस्तों के साथ वहां की सैर कर सकोगे।

मंगल के मुख्य अभियान

नासा ने जुलाई 1965 में मेरिनर 4 भेजा। नवम्बर 1971 को मेरिनर-9 मंगल पर पहुंचा, जिसने किसी अन्य ग्रह की परिक्रमा के लिए उसकी कक्षा में प्रवेश किया।

सोवियत संघ ने 1971 में दो यान मार्स-2 और मार्स-3 भेजे, जो मंगल पर तो उतरे, लेकिन कुछ ही समय बाद संचार बंद हो गया।

नासा ने वाइकिंग-1 और वाइकिंग-2 यान 1976 में मंगल पर उतारे, जो दो कक्षीय थे। इनसे काफी जानकारियां मिलीं।

1997 में नासा का मार्स ग्लोबल सर्वेयर मंगल की कक्षा में पहुंचा।

नासा का मार्स पाथ फाइंडर अभियान 1997 में सफल हुआ और यह मंगल के एरेस वालिस में उतरा। इसने काफी तस्वीरें भेजीं।

नासा का फीनिक्स मार्स लैंडर मई 2008 में मंगल पर पहुंचा, जिसने जल की पुष्टि की।

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