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जब-जब रामायण पर सीरियल बनेगा, लोग इसे देखना चाहेंगे

शान्तिस्वरूप त्रिपाठी First Published:10-08-2012 10:16:40 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
जब-जब रामायण पर सीरियल बनेगा, लोग इसे देखना चाहेंगे

लगभग 25 साल पहले आपके दादा रामानंद सागर ने एक रामायण बनायी थी। अब आप एक रामायण बना रहे हैं। दोनों में क्या फर्क है ?

रामायण हमारा पौराणिक धार्मिक ग्रंथ है। इसकी कहानी तो बदली नहीं जा सकती। इसलिए कहानी के स्तर पर मेरे दादा स्व. रामानंद सागर, जिन्हें हम सभी ‘पापाजी’ ही कहा करते थे, ने सीरियल ‘रामायण’में जो कहानी सुनायी थी, वही मैं भी सुना रहा हूं। कहानी में कोई अंतर नहीं है। ड्रामा भी वही है। पर तकनीक का अंतर है। ‘पापाजी’ ने सीमित साधनों व उस वक्त उपलब्ध तकनीक के आधार पर इसे परदे पर पेश किया था। तब से अब तक तकनीक में काफी बदलाव आया है। अब हमने कोशिश की है कि स्पेशल इफेक्ट्स व सेट आदि का बेहतर उपयोग करते हुए रामानंद सागर जी की ही रामायण को अति बेहतर स्वरूप में परदे पर पेश करें।

रामानंद सागर ने कई भाषाओं में उपलब्ध ‘राम चरित मानस’ में वर्णित घटनाक्रमों को आधार बना कर सीरियल ‘रामायण’ बनाया था। आपने किस रामायण को आधार बनाया हैं ?
हम साफ बता रहे हैं कि हमारा सीरियल तुलसीदास कृत ‘श्री राम चरित मानस’ पर आधारित है। पर पापाजी का सीरियल ‘रामायण’ हमारे लिए इंस्परेशन है। उन्होंने जो लिख दिया था, उन्होंने जो रामायण पेश की थी,उसे कोई मात नहीं दे सकता। मैं भी नहीं। कथा के स्तर पर या संवादों के स्तर पर मैं तो उनकी रामायण से तुलना कर भी नहीं सकता। मैं तो उन्हीं की रामायण से प्रेरणा लेकर एक बार फिर रामायण को लेकर हाजिर हुआ हूं।
पापाजी की रामायण को जबरदस्त सफलता हासिल हुई थी। क्या अब आपकी इस रामायण को उसी तरह दर्शक पसंद करेंगे ?

दर्शक हर अच्छी चीज को पसंद करता है। वाराणसी शहर के अंदर राम नगर में हर वर्ष दशहरा के समय रामायण परफॉर्म की जाती है। और वहां पर हर साल भारी भीड़ इकट्ठा होती है। तो रामायण एक ऐसी कथा है, जो बार-बार बननी चाहिए। जब-जब यह कथा बनेगी, तब तब दर्शक इसे देखना चाहेगा।

पर पीढ़ियों का अंतराल?
देखिए, हम रामायण को पेश करते समय तकनीक व इमोशंस को आज की पीढ़ी की सोच के मुताबिक उपयोग करते हुए अच्छी फील देने की कोशिश कर रहे हैं। पर हमारी कोशिश है कि पिछले 26 साल में टीवी देखने वाली जो नयी पीढ़ी तैयार हुई है, उसके साथ पुरानी पीढ़ी भी इस सीरियल को पहले की भांति पसंद करें।

कलाकारों के चयन को लेकर क्या फामरूला अपनाया हैं ?
कलाकारों का चयन करते समय हमने यह तलाशने की कोशिश की कि रामायण के जिस पात्र के लिए कलाकार चुन रहे हैं, उस पात्र में जो भावनाएं हैं, वह भावनाएं कलाकार में नजर आ रही हैं या नहीं। अब भगवान श्रीराम की हूबहू शक्लसूरत वाला कलाकार हम भले न दे सकें, पर हमने ऐसा कलाकार चुनने की कोशिश की है, जो कि परदे पर आए, तो उसके द्वारा निभाए जा रहे पात्र का भाव ही उभरकर आए। उसे देखते ही दर्शक कहें यही राम हैं,यही लक्ष्मण या भरत हैं।

आपको नहीं लगता कि आज आपके सीरियल को सफलता लिए काफी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी ? जबकि रामानंद सागर ने जब सीरियल ‘रामायण’का निर्माण किया था,तब इतनी प्रतिस्पर्धा नहीं थी ?

मैं यह तो नहीं कह सकता कि प्रतिस्पर्धा नहीं है। यह सच है कि अब सैकड़ों सेटेलाइट चैनल आ गए हैं। दर्शकों के पास मनोरंजन के तमाम साधन और सीरियल मौजूद हैं। पर हम तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में यकीन रखते हैं। यह कोई ऐसी दौड़ नहीं है, जिसे हम तेजी से दौड़ कर जीत सकते हैं। यह एक ऐसी प्रतिस्पर्धा हैं, जहां हम अपने काम को ईमानदारी से करके जीत हासिल कर सकते हैं। वैसे भी गीता में कहा गया है कि ‘कर्म करो फल की इच्छा मत करो।’

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