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दुनिया का सबसे महान आयोजन

अयाज मेमन खेल पत्रकार First Published:26-07-2012 08:43:36 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

मशहूर गायिका ओलिविया न्यूटन जॉन ने कहीं पर कहा था कि मेरा गाया हुआ कोई भी गीत सिडनी ओलंपिक के मौके पर मेरे गायन की भावना का मुकाबला नहीं कर सकता। इस भावना को मैं भी अच्छी तरह समझता हूं। ओलंपिक में किसी भी हैसियत से भाग लेना अपने आप में अनोखा अनुभव होता है। मैंने सिर्फ 1988 के सियोल ओलंपिक को देखा है। उसके पहले या उसके बाद कभी कुछ इस स्तर का अपनी आंखों से नहीं देखा।

जो बात ओलंपिक में है, वह कहीं नहीं है। भारत ने क्रिकेट के जो दो विश्व कप जीते, उनमें भी नहीं।  न हॉकी और फुटबॉल के किसी विश्व कप में है और न ही विंबलडन में। मैंने सुनील गावस्कर को अपना आखिरी टेस्ट मैच खेलते हुए देखा, सचिन को उनका पहला टेस्ट मैच खेलते हुए देखा, 1986 में शारजाह के मैदान पर जावेद मियांदाद का वह छक्का भी देखा है, जिसने पाकिस्तान को भारत के खिलाफ जीत दिलाई थी। लेकिन ओलंपिक वाली बात इन सबमें कहीं नहीं थी।

सियोल ओलंपिक में अच्छी और बुरी खबरों की भरमार थी। मसलन, ओलंपिक शुरू होने से पहले वहां कुत्ते के गोश्त पर पाबंदी लगा दी गई। स्थानीय लोग इसे बहुत पसंद करते हैं, लेकिन मेहमानों की भावनाओं का खयाल रखते हुए इसे बंद करा दिया गया। हालांकि, खेल गांव के बाहर हमें इसका कारोबार करने वाले कई रेस्तरां मिले। ऐसी बहुत सारी खबरों के बीच असल ध्यान खेलों पर ही था। लगातार दो ओलंपिक के अलग-अलग तरह के बायकॉट के बाद दुनिया के तमाम बेहतरीन खिलाड़ी एक बार फिर ओलंपिक मैदान में आ डटे थे। पहली बार टेनिस के पेशेवर खिलाड़ी उसमें भाग ले रहे थे। फिर प्रतिबंधित दवाओं के इस्तेमाल का मामला भी उछल रहा था। और पदक तालिका में अपने देश का नाम ऊपर ले जाने की होड़ तो थी ही। सबसे ज्यादा चर्चा में थी ‘शताब्दी की रेस’, जो कार्ल लेविस और बेन जॉनसन के बीच होनी थी। लेकिन इसमें भी दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ आया। सौ मीटर की यह रेस जब शुरू हुई, तो पूरे स्टेडियम में सब शांत थे। 80 मीटर से पहले ही जॉनसन काफी आगे हो गए थे, हांफते हुए कार्ल लेविस उनसे पीछे थे। बहुत से लोगों के लिए उस समय ओलंपिक की यही असली खबर थी। लेकिन 12 घंटे बाद ही इससे भी बड़ी खबर आ गई। रात में जब मीडिया गांव में हम गहरी नींद में थे, तो कनाडा के एक पत्रकार ने दरवाजे पर दस्तक दी। उसने बताया कि जॉनसन का डोप टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है और उन्हें वापस भेजा जा रहा है। जाहिर है कि लेविस ने जो पदक गंवाया था, वह फिर उन्हें मिल गया। लेकिन यह अटकल अभी तक लगाई जाती है कि अगर जॉनसन ने प्रतिबंधित दवा न ली होती, तो भी क्या वही जीतते? कुछ साल बाद जब मैं भारतीय क्रिकेट टीम के वेस्ट इंडीज दौरे के समय सेंट किट्स गया, तो वहां मेरी मुलाकात जॉनसन के डॉक्टर जेमी एस्टाफन से हुई। कहा जाता है कि एस्टाफन ने ही जॉनसन को स्टेनोजोलोल नाम की दवा दी थी। उन्होंने इस आरोप से पूरी तरह इनकार नहीं किया, लेकिन यह कहा कि इस मामले में सबसे बड़े अपराधी तो अमेरिकी हैं, वे डोपिंग करते भी हैं और इसे अच्छी तरह से छिपा भी लेते हैं।

एक दशक के भीतर मेरियन जोंस समेत अमेरिका के कई बड़े एथलीट के पदक डोपिंग के कारण वापस लेने पड़े। यहां तक कि सियोल ओलंपिक की सबसे मशहूर एथलीट फ्लोरेंस ग्रीथिफ जॉयनर की जब 38 साल की उम्र में मृत्यु हो गई, तो बाद में यही बताया गया कि यह डोपिंग का ही असर था। इन सबके बावजूद ओलंपिक में प्रतिबंधित दवाओं के इस्तेमाल को कभी पूरी तरह रोका नहीं जा सका। सुर्खियों में छाने और इनाम पाने के लिए एथलीट इन दवाओं के इस्तेमाल का जोखिम ले लेते हैं। कुछ पर पाबंदी लग जाती है और कुछ तो समय से पहले ही जान गंवा देते हैं। सियोल ओलंपिक में सौ मीटर की उस ऐतिहासिक दौड़ के अलावा भी कई महत्वपूर्ण क्षण थे। जैसे पुरुषों की 400 मीटर की बाधा दौड़। अमेरिका के दो एकदम नए खिलाड़ियों ने इस दौड़ के सबसे महान धावक एडविन मोजेज को पीछे छोड़ दिया। अपने हीरो को हराने के बाद उनकी आंखों में आंसू थे और तब उनकी तरफ से खुद मोजज को ही पत्रकारों से बात करनी पड़ी। मोजेज ने उस मौके पर जो गुण दिखाया, उसे देखते हुए कोई ताज्जुब नहीं कि आज वह एथलेटिक्स की सबसे बड़ी आवाज बन चुके हैं। डेकाथलन के डाले थॉमसन मेरे पसंदीदा खिलाड़ी थे, लेकिन वह चल नहीं सके। उनकी मांसपेशी में खिचाव आने की वजह से यह स्पष्ट हो गया था कि वह मेडल हासिल नहीं कर सकते। लेकिन वैसी स्थिति में भी उन्होंने अपने दस इवेंट पूरे किए। इसके बाद उन्होंने कहा था, ‘यह ओलंपिक है, इसमें भाग लेना ही गौरव की बात है।’
इस ओलंपिक भावना का मेरा अपना अनुभव अलग तरह का था। उद्घाटन समारोह के दौरान बाकी पत्रकारों की तरह मेरे पास एक पाउच था, जिसमें मेरा पासपोर्ट और ट्रैवल चेक थे। हमसे कहा गया था कि इस पाउच को अपनी सीट के नीचे रखें और मैंने वही किया। लेकिन कार्यक्रम के बाद मेरा पाउच वहां नहीं था। अब मेरे पास न पैसे थे और न पहचान पत्र। मैंने शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब मैं उधार के पैसों से काम चला रहा था। एक हफ्ते बाद एक जर्मन पत्रकार ने मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया। पाउच मेरी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, ‘क्या यह आपका है? मैं एक हफ्ते से आपको खोज रहा था। आप मिले, तो लग रहा है कि जैसे गोल्ड मेडल मिल गया।’ वह भारत का प्रशंसक था, कई बार भारत आ चुका था। जाते-जाते उसने पूछा, ‘आप लोग ओलंपिक मेडल कब जीतेंगे?’ अब मैं इस सवाल का जवाब देने की ज्यादा अच्छी स्थिति में हूं।

ओलंपिक में ऐसा क्या खास है? ऐसा कोई और आयोजन नहीं है, जिसमें पूरी दुनिया के लोग एक छत के नीचे जमा हो जाते हैं। लंदन ओलंपिक में 205 देश भाग ले रहे हैं। जिनमें कुछ ऐसे हैं, जो दुनिया के नक्शे पर एक बारीक बिंदु जितने ही दिखते हैं, कुछ का तो नाम तक ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा। इससे खेलों को एक सार्वभौमिकता मिलती है। यहां ऐसे खेल हैं, जिनमें इंसान की भौतिक और मानसिक क्षमताओं की पूरी परीक्षा हो जाती है। ओलंपिक के पांच छल्ले दुनिया का सबसे जाना पहचाना स्पोर्ट्स ब्रांड बन चुके हैं। यह पूरी धरती को जोड़ता भी है। निस्संदेह यह कई तरह से इस धरती का सबसे महान आयोजन है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
 
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