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दरिद्रता से उबरे

First Published:20-03-2012 09:32:28 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

यह अच्छी खबर है कि भारत में गरीबों की तादाद घट रही है और घटने की रफ्तार भी तेज हुई है। योजना आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2004-2005 में भारत में 37.2 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी, 2009-2010 में यह 29.8 प्रतिशत रह गई। यह दौर था, जब भारत का आर्थिक विकास की दर औसतन साढ़े आठ प्रतिशत के आस-पास थी। हालांकि 2009 में खराब मानसून की वजह से खेती को काफी नुकसान पहुंचा था। इस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी में शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा तेजी से कमी आई। अगर इस बात को मान भी लिया जाए कि हमारे देश में गरीबी का मानदंड कुछ ज्यादा नीचे है, यानी गरीबी रेखा के ऊपर उसे मान लिया जाता है, जो किसी तरह से अपना गुजर-बसर कर ले, लेकिन यह भी मानना होगा कि इस बीच गरीबी की रेखा से उबरे हुए लोगों की आय में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही यह भी कहना होगा कि यह उपलब्धि भी संतोषजनक नहीं है और अगर देश से गरीबी हटानी है, तो इसकी रफ्तार और ज्यादा तेज करनी होगी। अगर इस गति से गरीबी कम हुई, तो संभवत: अगले बीस बरसों में गरीबी का उन्मूलन संभव होगा। ऐसा तब है, जबकि आगे कि राह ज्यादा कठिन है। इस वर्ष विकास दर सात प्रतिशत का आंकड़ा शायद ही छू पाए। इसके आगे विकास दर को बढ़ाने के लिए काफी बड़े पैमाने पर आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों को अमल में लाना होगा, ताकि निवेश में जो ठहराव आ गया है, वह टूट सके। जिन्हें दूसरी पीढ़ी का सुधार कहा जा रहा है, उनकी राह के रोड़े हटाना ज्यादा मुश्किल होगा। एक और समस्या जो 2005-2010 के दौर में भी दिखाई देती है और आगे और ज्यादा विकट हो सकती है, वह रोजगार की है। 2005-2010 के दौर में भी रोजगार बहुत तेजी से नहीं बढ़े हैं और संगठित क्षेत्र के रोजगारों में बढ़ोतरी की दर तो कम हुई है। असंगठित क्षेत्र में रोजगार ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। जब तक उद्योगों में बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं बढ़ेंगे और खेती पर निर्भर लोगों की तादाद तेजी नहीं घटेगी, तब तक गरीबी का तेजी से घटना मुश्किल है। इसके लिए निवेश के अलावा शिक्षा और प्रशिक्षण पर जोर देना जरूरी है। परंपरागत किस्म के रोजगारों पर आश्रित लोगों के लिए मुश्किल यह है कि उनके पास वैसी शिक्षा और कौशल नहीं है, जिससे वे नए रोजगारों में खप सकें। इससे हो यह रहा है कि उद्योगों में कुशल और प्रशिक्षित लोगों की कमी पड़ रही है, दूसरी ओर बेरोजगार या अकुशल किस्म के कामों में अनियमित रोजगार करने वाले नौजवानों की तादाद बढ़ रही है।
अर्थव्यवस्था की तरक्की के लाभ सब तक न पहुंच पाने का एक बड़ा नतीजा यह है कि आय के बंटवारे में असंतुलन बढ़ रहा है, यानी गरीबों और अमीरों के बीच की खाई बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह यही है कि हमारी बड़ी जनसंख्या में नए आर्थिक माहौल का फायदा उठाने के लिए जरूरी योग्यता नहीं है। अगर हमें गरीबी से बाहर आने वाले लोगों की तादाद तेजी से बढ़ानी है और यह भी सुनिश्चित करना है कि जो लोग गरीबी से उबरे हैं, वे फिर उसी दलदल में न चले जाएं, तो शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना होगा। गरीब लोग यह समझते हैं कि शिक्षा कितनी जरूरी है और वे अक्सर अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई में खर्च करते हैं, लेकिन सीमांत परिवारों के लिए यह बहुत अनिश्चित-सी स्थिति होती है। सस्ती और अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा भविष्य में आर्थिक विकास की अनिवार्य शर्त है और साथ ही गरीबी को खत्म करने का सबसे बड़ा जरिया भी।

 
 
 
 
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