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सच्ची खुशी का राज

First Published:11-02-2012 10:23:19 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

सच्चा सुख क्या है? कई बार हम जिन चीजों को लेकर सोचते हैं कि हम इन्हें पाकर खुश हो जाएंगे, वे अंतत: गलत साबित होती हैं। हम बेवजह ही बनावटी सुख के लिए जीवन की सच्ची खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं। अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए चिंता करना फिजूल है। हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डेन गिलबर्ट कहते हैं कि असीमित इच्छाओं के पीछे भागना बेकार है। सुख और दुख स्थायी नहीं होते हैं। मनचाही मुराद पूरी होने पर भी हम लंबे समय तक खुश रहेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए हमारे पास जो है, उसे लेकर खुश रहना ही बेहतर है।

दुख या सुख स्थायी नहीं
हमने अब तक जितने भी अध्ययन किए हैं, उनमें एक बात जो उभरकर सामने आई है, वह वाकई दिलचस्प है। मेरा मानना है कि हमारी जीत या हार का प्रभाव बहुत दिनों तक हमारी खुशियों पर नहीं रहता। बात चाहे चुनाव जीतने या हारने की हो, मनपसंद जीवनसाथी मिलने या नहीं मिलने की हो, नौकरी में तरक्की पाने या न पाने की हो या फिर परीक्षा में पास या फेल होने का मसला हो, इन चीजों को लेकर हम लंबे समय तक सुखी या दुखी नहीं रह सकते। मैं इसे इस तरह समझाता हूं। जब हमें किसी क्षेत्र में जीत हासिल होती है, तो हम तुरंत खुश हो जाते हैं, पर कुछ समय बाद हमारी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। हम और ज्यादा पाने की चाहत में चिंतित हो जाते हैं। मनचाही मुराद पूरी न होने पर हम तुरंत दुखी होते हैं, लेकिन कुछ समय बाद हम सहज हो जाते हैं और आगे के बारे सोचने लगते हैं।

कई बार हम बनावटी सुख का आनंद लेने लगते हैं। सर थॉकस ब्राउन ने 1642 में कहा था, ‘मैं दुनिया का अकेला सुखी व्यक्ति हूं। मेरे अंदर ऐसी क्षमता है कि मैं गरीबी को अमीरी और दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल सकता हूं।’ दिलचस्प बयान है। आखिर इस व्यक्ति के दिमाग में ऐसा क्या था, जिसे लेकर वह खुद को इतना सुखी महसूस करता था। दरअसल हम इंसानों के अंदर एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोधक क्षमता (साइकोलॉजिकल इम्यून सिस्टम) होती है। यह एक तरह की संज्ञान प्रक्रिया है। या यूं कहें कि यह ऐसी संज्ञान प्रक्रिया है, जिसे लेकर हम ज्यादा सजग नहीं होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक प्रतिरोधक क्षमता की मदद से हम अपनी सुविधा के अनुसार खुद को सुखी बना लेते हैं।

यूं भी रह सकते हैं खुश
कई बार लोग बेवजह बनावटी खुशी जाहिर करते हैं। मसलन गलती करने और सजा पाने के बाद यह कहना है कि हमें इसे लेकर कोई पछतावा नहीं। कई बार समझ में नहीं आता कि जनाब इतना सब होने के बाद भी कैसे खुश हैं। शायद यही है बनावटी खुशी। कई बार जब हमें मनचाही चीज नहीं मिलती, तो हम कहते हैं, अरे मुङो उसकी जरूरत ही नहीं थी। मसलन अगर मंगेतर सगाई की अंगूठी निकालकर फेंक दे, तो आप कह सकते हैं, जाने दो वह तो मेरे लायक ही नहीं थी या फिर इंटरव्यू में पास नहीं हो सके, तो आप खुद को दिलासा दे सकते हैं कि हमें कोई जरूरत नहीं थी उस नौकरी की।

स्वाभाविक और बनावटी सुख
सुख दो तरह का होता है: बनावटी और स्वाभाविक। दोनों तरह के सुख में एकदम स्पष्ट अंतर है। जब हमारी मनचाही मुराद पूरी हो जाती है, तो हमें स्वाभविक सुख का अहसास होता है। यानी जब हमें वह हासिल होता है, जिसकी हमने इच्छा की थी, तो हम वास्तविक रूप में खुश होते हैं। दूसरी तरफ जब अपनी मुराद पूरी न होने पर भी खुशी का इजहार करते हैं, तो वह बनावटी होता है। जाहिर है, मनचाही चीज नहीं मिलने पर हम सहज खुशी नहीं महसूस करते, लेकिन अक्सर हमें दूसरों के सामने यह दिखाना होता है कि हम खुश हैं। अक्सर लोग ‘बनावटी सुख’ को बेहतर नहीं मानते। क्यों? दरअसल लोगों को लगता है कि मनचाही चीज मिलने पर उन्हें वास्तविक सुख मिलता। अगर मनचाही चीज न भी मिले, तो आप खुश रह सकते हैं। लिहाजा बनावटी खुशी के साथ भी आप सुख का अहसास कर सकते हैं।

ज्यादा विकल्प, ज्यादा भ्रम
हमारे पास जितने ज्यादा विकल्प होते हैं, हम खुशियों को लेकर उतना ही ज्यादा भ्रमित भी रहते हैं। हमने इसे लेकर शोध किए। हमने लोगों को कई चीजें दीं और उनमें से एक को चुनने को कहा। कई सारे विकल्प पाकर लोग भ्रमित हो गए। पहले तो उन्होंने एक मनचाही चीज चुन ली, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि काश! हमने कुछ और चुना होता, तो ज्यादा अच्छा होता। यानी जब हमारे सामने बहुत ज्यादा विकल्प होते हैं, तो अक्सर हम यह तय नहीं कर पाते कि हम किसे पाकर सचमुच खुश होंगे।

जो बस में नहीं, उसके लिए दुख क्यों
जो चीजें आपके बस में नहीं हैं, उन्हें लेकर आपको दुखी नहीं होना चाहिए। जिसे आप नहीं बदल सकते, उसे स्वीकार करना ही बेहतर है। जब हम वाकई जिंदगी की उलझन में फंस जाते हैं, तो मनोवैज्ञानिक प्रतिरोधक क्षमता बहुत काम आती है। जैसे आप समझते हैं कि डेटिंग और शादी में बहुत अंतर है। अगर डेटिंग के दौरान आपको लड़की की कोई आदत पसंद न आए, तो आप रिश्ता तोड़ सकते हैं, लेकिन शादी हो जाए, तो निभाना ही होगा। ऐसे में हमें उसकी गलत आदतों को भी हंसकर टालना होगा।

सीमित रखें इच्छाएं
जब हमारी महात्वाकांक्षाएं सीमित होती हैं, तो हम आनंदपूर्वकजीवन जीते हैं, लेकिन जब हमारी इच्छाएं असीमित होती हैं, तो हम झूठ व धोखे का सहारा लेते हैं। हम अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए दूसरों को कष्ट देने लगते हैं। अक्सर हम अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने जीवन की सच्ची खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं। जब हमारी चिंताएं सीमित होती हैं, तो हम सोच-विचारकर सजग फैसले करते है, पर जब हमारी चिंताएं असीमित हों, तो हम कायरतापूर्ण व हड़बड़ी वाले फैसले करते हैं। हमारी इच्छाएं व चिंताएं अनंत हैं, इनके पीछे भागना फिजूल है।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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