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जो जितना रचेगा, वह उतना बचेगा

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार First Published:07-01-2012 07:49:44 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

प्रश्न- ‘जो रचेगा, सो बचेगा’ लेखकीय सूत्र की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

उत्तर- यह ग्लोबलाइजेशन के बाद के साहित्य का अमोघ सूत्र है। सूत्रानुसार लेखक ‘रचकर’ धरती पर अहसान करता है और ‘बचकर’ ‘घमासान’ करता है।

भावार्थ- रचना यानी बचना! यहां साहित्य ‘स्टरॉयड’ है! जैसे ही साम्राज्यवाद साहित्य को मारने आता है, वैसे ही साहित्यकार कह उठता है, ‘जो रचेगा, सो बचेगा’! यह ‘महामंत्र’ सुनते ही साम्राज्यवाद दुम दबाकर भाग खड़ा होता है।

प्रसंग- बाजार में सब नष्ट हो गया है। सिर्फ ‘साहित्य’ बचा है, क्योंकि वह हिंदी में ‘रचा’ है। जो ‘बचनाकार’ है, वही ‘रचनाकार’ है। ‘नरेगा’ की तुक ‘मरेगा’ है। ‘रचेगा’ की ‘बचेगा’ है।

यहां ‘लेखक’ से आशय वह ‘मानव’ है, जो रिटायरमेंट से पूर्व व पश्चात ‘रचता-बचता’ रहता है। ‘रचना’ के साथ ‘बचना’ फ्री है। रचना यानी संघर्ष। ‘बचना’ यानी करियर। ‘रचना-बचना’ गुह्य पंथ है! ‘रचना’ का उपनाम है ‘बचना।’ ‘बचना’ का अग्र नाम ‘रचना।’ ‘रचना-बचना’ यानी ‘शंकर-जयकिशन’!

अद्भुत पदमैत्री- ‘रचना-बचना’ श्लेषी हैं। रचना यानी सृष्टि और ‘बचना’ यानी पूरी ‘डिफेंस मिनिस्ट्री।’ ‘उसने कहा था’ कहानी के लहना सिंह की तरह लेखक पता नहीं क्या-क्या ‘रचता’, किस-किस से ‘बचता’ दौड़ता दिखलाई देता है।

विशेष टिप्पणी- हिंदी का लेखक एक सामाजिक प्राणी होता है। वह दिल्ली में रहता है या दिल्ली में रहने की कामना करता रहता है। दिल्ली न आ पाने की स्थिति में वह जहां होता है, वहीं एक ‘दिल्ली’ बना लेता है। जिसे देख दिल्ली वाले चकित होकर रह-रहकर कह उठते हैं कि देखो, वहां साहित्य बचा हुआ है, यहां बचा हुआ है और उस छोटे-से कस्बे में बचा हुआ है, जिसमें अभी एक ‘रचना-बचना’ शिविर हुआ है। दिल्ली का नया नाम ‘रचना-बचना सिटी’ है।

हिंदी का लेखक सदैव संकट में रहता है। सबसे डरा-डरा रहता है। बीवी और बच्चे डराते हैं। अनपढ़ मुहल्ला डराता है। चौड़ी सड़कें डराती हैं। कंक्रीट की बिल्डिंगें डराती हैं। बेशउर भीड़ और शोर उसका एकांत छीनकर उसे डराता रहता है। ‘समाज’ साहित्य विरोधी है। साहित्यकार की जगह कम हो चुकी है, हो रही है। होनी है। लेकिन लेखक ‘रचता रहेगा, बचता रहेगा।’ अटल विश्वास है। ‘रचते रहना’ ‘बचते रहने’ के इतिहास में एंट्री लेने का अचूक नुस्खा है।

‘रचना-बचना’ वह मौलिक क्रिया है, जिसकी खबर अमेरिका व यूरोप को हो गई है। तभी से अमेरिका और यूरोप चकित हैं और अनुवाद कर्म में लगे हैं। लेखक इसे देख कहने लगे हैं। देखो, साहित्य वहां ‘बचा’ हुआ है, क्योंकि वह उसका ‘रचा’ हुआ है। ‘रचना-बचना’ सूत्रनुसार, जो जितना रचेगा, उतना बचेगा। जिस तरह रचेगा, उस तरह बचेगा। जिस भाव रचेगा, उस भाव बचेगा।

दिल्ली में ‘रचना’ दिल्ली में ‘बचना’ है। दिल्ली में बचना, दिल्ली में ‘जंचना’ है। दिल्ली में ‘जंचना’, दिल्ली में ‘नचना’ है। दिल्ली में ‘नचना’, दिल्ली में ‘पचना’ है। दिल्ली में ‘बचे’ लेखक रहते हैं। जिस तरह शाम को सब्जी वाले के पास बचा हुआ पालक मिलता है, उसी तरह बचा लेखक दिल्ली में मिलता है। हिंदी साहित्य ‘बचे हुए’ का ‘बचा हुआ’ है। गब्बर की गोली खाकर ‘तीनों’ बच गए थे। इधर सारे के सारे ‘रचना-बचना’ की गोली खाकर सारे के सारे बचे हुए हैं। नागाजरुन की कविता में आखिर में ‘अंडा’ बचा था, दिल्ली में साहित्य का ‘पंडा’ बचा है! कैसी ‘रचना’ राम बनाई!

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