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मैं क्रांतिकारी हूं, अहिंसक क्रांतिकारी

महात्मा गांधी First Published:01-10-2011 09:51:58 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

महात्मा गांधी 1931 में जब यूरोप के दौरे पर थे, तो वामपंथी पत्रकार चार्ल्स पेट्राश ने उनका इंटरव्यू लिया था। बाद में यह इंटरव्यू फ्रेंच अखबार ला-मांद में छपा। इस इंटरव्यू की खासियत यह थी कि इसमें पेट्राश ने गांधीजी से वर्ग संघर्ष और भारत के अमीर वर्ग के बारे में तमाम सवाल पूछे और इन सब चीजों के बारे में महात्मा गांधी क्या सोचते थे, यह बात सामने आई। प्रस्तुत हैं इंटरव्यू के कुछ अंश:

आपको क्या लगता है कि भारत के राजाओं, जमींदारों, उद्योगपतियों और बैंकरों ने अपनी संपत्ति को कैसे हासिल किया है?
फिलहाल तो जनता का शोषण करके ही।

क्या मजदूरों और किसानों के शोषण के बिना भी वे अमीर बन सकते हैं?
हां, वे एक हद तक बन सकते हैं।

क्या उन्हें उस मजदूर से बेहतर सामाजिक जिंदगी जीने का अधिकार है, जो उनके लिए मेहनत करता है?
कोई अधिकार नहीं है। मेरा सामाजिक सिद्धांत यह कहता है कि हम सब बराबर पैदा हुए हैं, इसलिए हमें बराबर अवसर का अधिकार है, इसके बावजूद हम सबकी क्षमताएं बराबर नहीं हैं। हमारी कुदरत ही ऐसी है कि हम सब एक हैसियत के नहीं हो सकते। ऐसा नहीं हो सकता कि हम सबकी चमड़ी का रंग एक हो, हममें एक ही स्तर की बुद्धि हो, इसका नतीजा ही है कि हममें से कुछ लोग ज्यादा भौतिक सुविधाएं बटोरने की क्षमता रखते हैं। जिनमें यह क्षमता है, वे इसी काम में जुट जाते हैं। वे अपनी इन क्षमताओं का अच्छा इस्तेमाल करें, तो यह फायदा लोगों तक पहुंचा सकते हैं। तब वे जनता के ट्रस्टी होंगे और कुछ नहीं।

हमें ज्यादा बुद्धि वाले व्यक्ति को ज्यादा हासिल करने देना चाहिए, उसे अपनी क्षमताओं के इस्तेमाल से रोकना नहीं चाहिए। लेकिन उनकी कमाई में जो सरप्लस है, वह जनता के पास जाना चाहिए। जैसे बच्चों की कमाई का सरप्लस परिवार के पास चला जाता है। वे सिर्फ इस पैसे के ट्रस्टी हैं, और कुछ नहीं। इस चीज को लेकर मैं काफी निराश हूं, लेकिन इस आदर्श में मेरा पूरा विश्वास है। मौलिक अधिकारों की घोषणा में इसे समझा जाना चाहिए।

क्या आप बुद्धि का इस्तेमाल करने वालों के लिए ज्यादा धन की मांग करेंगे?
आदर्श स्थिति में तो किसी को भी अपनी बुद्धि के इस्तेमाल के लिए ज्यादा धन की मांग नहीं करनी चाहिए। जिसे यह बुद्धि मिली है, वह इसका इस्तेमाल सामाजिक मकसद के लिए करे।

क्या आपको लगता है कि भारतीय किसानों और मजदूरों को अपनी आर्थिक आजादी के लिए वर्ग संघर्ष करना चाहिए?
मैं खुद उनके लिए क्रांति कर रहा हूं, बिना किसी हिंसा के।

अगर वे राजाओं, जमींदारों, पूंजीपतियों और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांति करते हैं, तो आपका नजरिया क्या होगा?
मेरा नजरिया यह होगा कि अच्छी हैसियत वाले वर्गो के पास जो संपत्ति है, उन्हें उसका ट्रस्टी बनाया जाए। इसका अर्थ हुआ कि वे अपना धन अपने पास रख सकते हैं, लेकिन वे इसका इस्तेमाल लोगों के कल्याण के लिए करेंगे। और इसके लिए उन्हें कमीशन मिलेगा।


यह ट्रस्टीशिप कैसे लागू होगी? उन्हें राजी करके?
सिर्फ मौखिक रूप से उन्हें राजी करके ही नहीं। मुझे अपने समय के सबसे बड़ा क्रांतिकारी कहा जाता है। शायद यह सही नहीं है, पर मैं मानता हूं कि मैं क्रांतिकारी हूं, एक अहिंसक क्रांतिकारी। मेरा हथियार असहयोग है।

क्या आप आम हड़ताल का समर्थन करते हैं?
आम हड़ताल भी एक तरह का असहयोग है। जरूरी नहीं कि यह हिंसक हो। ऐसा आंदोलन शांतिपूर्ण है और हर तरह से जायज है, तो मैं उसका नेतृत्व करने को तैयार हूं। इसे हतोत्साहित करने की बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

आपकी ट्रस्टीशिप की बात समझ में नहीं आई, खासतौर पर कमीशन की?
उन्हें कमीशन लेने का अधिकार है, क्योंकि धन उनके अधिकार में है। उन पर कोई ट्रस्टी बनने के लिए दबाव नहीं डालता, मैं उन्हें ट्रस्टी की तरह काम करने के लिए आमंत्रित करूंगा। मैं संपत्ति के सभी स्वामियों से कहता हूं कि वे ट्रस्टी बनें। उन्हें यह काम संपत्ति के स्वामी के रूप में नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रतिनिधि के रूप में करना होगा, जिनका उन्होंने शोषण किया है। मैं उनके कमीशन के लिए कोई आंकड़ा नहीं तय कर रहा हूं, बल्कि कह रहा हूं कि वे उतने की ही मांग करें, जितने के वे खुद को हकदार समझते हैं। मसलन, अगर किसी के पास सौ रुपये हैं, तो मैं उसे कहूंगा कि वह 50 अपने पास रखे और बाकी 50 मजदूरों पर खर्च करे। लेकिन अगर किसी के पास लाखों रुपये हैं, तो मैं उससे कहूंगा कि वह एक प्रतिशत अपने पास रख ले। इस तरह से आप देखेंगे कि मैंने कमीशन के लिए कुछ तय नहीं किया है, क्योंकि यह तो बहुत बड़ा अन्याय होगा।

जनता महाराजाओं और जमींदारों को अपना दुश्मन मानती है। अगर यह जनता सत्ता में आकर इन्हें खत्म कर दे, तो आप क्या कहेंगे?
फिलहाल तो लोग महाराजाओं और जमींदारों को अपना दुश्मन नहीं मानते। लेकिन यह जरूरी है कि जो गलत हो रहा है, उसके प्रति उन्हें जागरूक किया जाए। मैं लोगों को यह नहीं सिखाता कि वे पूंजीपतियों को अपना दुश्मन मानें, मैं उन्हें यह बताता हूं कि ये लोग खुद ही अपना नुकसान कर रहे हैं। मेरे लोग जनता को यह नहीं बताते कि अंग्रेज या जनरल डायर बुरे हैं, बल्कि यह बताते हैं कि वे सभी एक व्यवस्था के शिकार हैं, इसलिए उस व्यवस्था को खत्म करना जरूरी है, व्यक्ति को नहीं।

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