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ब्लॉग वार्ता : संकट में एग्रीगेटर

रवीश कुमार First Published:25-01-2011 09:22:35 PMLast Updated:25-01-2011 09:33:43 PM

हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया का ट्रांसफॉर्मर गिर गया है। बिना किसी आंधी और शोर-शराबे के। अभी तक जितने भी एग्रीगेटर आए, सब एक-एक कर बंद होते चले गए। एग्रीगेटर वह मंच होता है, जिससे सारे ब्लॉगर जुड़े होते हैं और जहां पता चलता है कि किस ब्लॉगर ने क्या लिखा है। नारद, चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी बंद हो चुके हैं। इसलिए नए ब्लॉगरों का आना, पुराने पर लिखा जाना, इनकी जानकारी कम मिल पा रही है। हर बार कोई इस शून्य को भरने की कोशिश करता है, मगर कुछ समय के बाद फिर से शून्य बन जाता है।

रविकांत ने ई-मेल से सूचना दी है कि चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी के बंद होने के बाद ‘लालित्य’ एक नया एग्रीगेटर आ गया है। इसके संकलनकर्ता ने साफ कर दिया है कि इस पर अनाप-शनाप ब्लॉग की भीड़ नहीं होगी। उनकी पसंद के कुछ ब्लॉग हैं, जो गुणवत्ता और नियमित रचना के आधार पर चुने गए हैं।

www.lalitkumar.in टाइप करने में कुछ ब्लॉग के बारे में नई सूचनाएं देखकर रोमांचित हो उठा। ललित कुमार ने इस एग्रीगेटर को अपनी पसंद के लिए बनाया था, लेकिन अब सार्वजनिक कर दिया है। उम्मीद है कि कोई हिंदीवाला एक सार्थक और टिकाऊ एग्रीगेटर बनाने की भी पहल करेगा।

इस हफ्ते के ब्लॉग वार्ता के लिए लालित्य का शुक्रगुजार हूं। घंटों लग जाते थे ब्लॉग ढूंढ़ने में। इधर-उधर नाम के एक ब्लॉग पर नजर पड़ी। http://kaulonline.com। रमण कौल का एक लेख है- सफर पराई रेल की।

वाशिंगटन-बोस्टन असेला एक्सप्रेस पर मेरे सामने की सीट पर खिड़की के साथ एक महिला बैठी है, वह पिछले पौने घंटे से फोन पर बात करने में लगी हुई है। ऐसा लगता है कि वह अपने दफ्तर का कोई मसला हल कर रही है। उसे अपने बॉस से शिकायत है और इस बारे में या तो वह अपने सहकर्मी से या फिर अपने बॉस के सहकर्मी से बात कर रही है। लगातार बोले जा रही है। तभी एक अनाउंसमेंट होती है कि यात्रीगण ध्यान दें, जो यात्री फोन पर बात कर रहे हैं, वे अपने सहयात्रियों का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज धीमी रखें या फिर कैफे यान में चले जाएं।

ऐसी तकलीफ तो हिन्दुस्तान में रोजाना होती है। पिछले दिनों पटना से आ रहा था। ट्रेन में एक सज्जन सवार हुए। सवार होते ही फोन पर लगे चिल्लाने। ऐ पिंटू, देखो चाचा को बोल देना। आ सुनो, ऊ बतिया मत भूल जाना। जाकर उनके यहां न्योता कर देना। इसके बाद अंकल जी ने अपने पिंटू को समझाते हुए एक रिश्तेदारपुराण रच डाला कि कैसे प्राण देकर भी रिश्तेदारों के यहां न्योता करने जाना चाहिए। यही सिस्टम है।

उनकी आवाज ट्रेन की अपनी आवाज से भी ज्यादा थी। बीच में जब कनेक्शन थरथराता था, तो वह एं-ऊं-का-कूं करने लगते थे। खैर रमण कौल अपनी इस यात्रा में एक भारतीय टीटी से टकरा जाते हैं। नाम पूछते हैं, तो टीटी जी बताते हैं जश चौंड्रश। रमण को कुछ शक हुआ। जब उन्होंने उनके कार्ड पर नजर गड़ाई, तो उस पर लिखा था चंद्रेश जोशी। यह पंक्ति पढ़कर मैं खूब हंसा। यह भी हमारे यहां होता है। हिंदी जगत का कोई प्राणी जब इंग्लिश जगत का नया-नया नागरिक बनकर लौटता है, तो वह भी इस तरह टेढ़े-मेढ़े उच्चारण करता है।

रमण कौल ने भी यह लेख इस इरादे से लिखा है कि वह भारत और अमेरिका की रेल यात्रा का अंतर बयान कर सकें। अमेरिका में रेल यात्रा हवाई यात्रा से भी महंगी है। वहां शताब्दी के एसी चेयर कार जैसे डिब्बे होते हैं। सीटें आरक्षित नहीं हैं। ट्रेनों में वाइ-फाइ उपलब्ध है। पांच-छह बिजनेस क्लास डिब्बे हैं। एक क्वायट कार भी होती है, जहां बात करने की कतई इजाजत नहीं है।

रमण हिंदी में इंटरनेट तकनीक की काफी जानकारियां देते हैं। जी-मेल में कैसे लेख के बीच में तस्वीर डालें, अगर आपने मेल भेज दिया, तो कैसे उसे पहुंचने से रोका जाए और गूगल ने उर्दू में लिखने और अनुवाद करने की भी सुविधा आपको दे दी है। टी वी रमण रामन के बारे में यहां पढ़ना चाहिए। वह अमेरिका के कार्नेल यूनिवर्सिटी से पीएचडी हैं और नेत्रहीन हैं।

रामन गूगल में ही काम करते हैं और इंटरनेट को नेत्रहीन लोगों के लिए सुलभ बनाने के कार्य में लगे हुए हैं। ऑप्टिकल कैरेक्टर रेकग्निशन और वाचक ब्राउजर के मेल से नेत्रहीन किसी भी दस्तावेज को पढ़ सकते हैं। रामन का एक बयान है। मैं बिना कागज की दुनिया में रहना पसंद करता हूं और हर कागज के टुकड़े को स्कैन करता हूं। रमण कौल ने रामन से पूछा है कि हिंदी और भारतीय भाषाओं में कब तकनीकी प्रगति होगी। जवाब में रामन ने कहा है कि स्थिति बहुत निराशाजनक है।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है, naisadak.blogspot.com

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