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विज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर बना साल 2012

नई दिल्ली, एजेंसी First Published:26-12-2012 11:22:14 AMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
विज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर बना साल 2012

वर्ष 2012 को वैज्ञानिक उपलब्धियों के वर्ष के रूप में भी याद किया जा सकता है। ऐसे में जब हम इस वर्ष को विदाई दे रहे हैं, पीछे मुड़कर देखने पर कई ऐसी घटनाएं दिखाई देती हैं, जो विज्ञान के क्षेत्र में मील के पत्थर की तरह हैं। ऐसी कुछ प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं :

ईश्वरीय कण की पुष्टि :
इस वर्ष चार जुलाई को लार्ज हैड्रोन कोलाइडर के भौतिकशास्त्रियों का पांच दशक लम्बा प्रयोग उस समय अपनी परिणति पर पहुंच गया, जब उन्होंने ईश्वरीय कण के पाए जाने की घोषणा की। यह कण अन्य सभी उपपरमाण्विक तत्वों के लिए जिम्मेदार है, जैसे कि प्रोटान और इलेक्ट्रॉन, उनके द्रव्यमान। यह कण मानक मॉडल में अंतिम टुकड़ा भी है। यह सभी ज्ञात कणों और बलों की अंतरक्रिया की व्याख्या करने में सक्षम है। अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मानवीय इतिहास के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रायोगिक सफलता के साथ अब कई नए आविष्कारों के लिए भी रास्ता साफ हो गया है।

मंगल पर पहुंचा क्युरीऑसिटी :
इस वर्ष छह अगस्त को नासा का आधुनिक और विशिष्ट अंतरिक्ष यान क्युरीऑसिटी मंगल पर पहुंचा। इस सफलता का गवाह बनने के लिए लाखों लोग या तो बहुत देर तक जागते रहे या फिर तड़के उठ गए थे। उसके बाद से क्युरीऑसिटी ने मंगल पर मौजूद चट्टानों और वहां के वातावरण के बारे में चकित करने वाली जानकारियां भेजी है। क्युरीऑसिटी की सफलता से उत्साहित नासा ने हाल में घोषणा की है कि क्युरीऑसिटी के बचे कल-पुर्जो से एक नया अंतरिक्ष यान मिर्मित किया जाएगा और उसे 2020 में मंगल पर भेजा जाएगा।

दुर्लभ जेनेटिक वैरियेंट्स का उदय :
पिछले वर्ष दुर्लभ जेनेटिक वैरिएंट्स से सम्बंधित अनुसंधान के परिणाम सामने आए। ये वैरिएंट्स अत्यंत खास थे, जिन्हें प्रारम्भिक उपकरणों से पहचाना गया। अभीतक वैज्ञानिकों ने बहुत ही आम तरह के वैरिएंट्स का विश्लेषण किया था। इस नए जेनेटिक वैरिएंट्स का सीधा अर्थ यह होता है कि मनुष्य के विकास के बारे में अब पहले से अधिक विश्लेषण किया जा सकता है।

भ्रूणों के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग :
सिएटल में युनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के अनुसंधानकर्ताओं ने जून में मां के रक्त में तैरने वाले डीएनए के टुकड़े का इस्तेमाल कर एक पूर्ण भ्रूण सम्बंधित जीनोम की सफल सिक्वेंसिंग की घोषणा की। पूर्व की तकनीकों के विपरीत यह पूरी तरह गैरआक्रामक है और आने वाले शिशु को इससे कोई खतरा नहीं पैदा होता। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह परीक्षण मात्र पांच वर्षों में चिकित्सकीय उपयोग के लिए उपलब्ध हो सकता है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत का बेहतर देखरेख किया जा सकता है।

क्वांटम टेलीपोर्टेशन डिस्टैंस रिकॉर्ड टूटा :
गर्मियों के दौरान अनुसंधानकर्ताओं के दो दल ने क्वांटम कणों को खुली हवा में 50 मील से अधिक दूरी तक भेजकर एक विश्व कीर्तिमान को तोड़ दिया। इन दो दलों में एक चीन और दूसरा आस्ट्रिया से था। वैज्ञानिक अब इस बिंदु पर सोच रहे हैं कि वे एक दिन कणों को अंतरिक्ष में स्थित किसी उपग्रह पर भेजने में कामयाब हो सकते हैं और उन्हें वापस पृथ्वी पर किसी स्थान पर वापस आपतित करा सकते हैं।

जीवन का नया रासायनिक कोड :
पिछले तीन अरब वर्ष से पृथ्वी पर जीवन, जानकारियों से भरे दो अणुओं -डीएनए व आरएनए- पर निर्भर रहा है। अब एक नया अणु एक्सएनए खोजा गया है। यह ब्रिटेन के मेडिकल रिसर्च काउंसिल के आण्विक जीवविज्ञानियों- विटोर पिन्हेरो और फिलिप हॉलिगर द्वारा एक पॉलिमर सेंषित अणु है। डीएनए की तरह एक्सएनए भी आनुवांशिकीय जानकारियों का भंडारण करने में सक्षम है। डीएनए के विपरीत इसमें अपने अनुरूप तोड़-मरोड़ करने की गुंजाइश है।

स्पेसएक्स की अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र की उड़ान :
स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नॉलॉजीज कॉरपोरेशन, यानी स्पेसएक्स के लिए यह बहुत ही अच्छा वर्ष रहा है। 2010 में ड्रैगन अंतरिक्ष यान की सफल लांचिंग और पृथ्वी की कक्षा में उसे स्थापित करने के बाद स्पेसएक्स ने 2012 में अबतक की सबसे बड़ी सफलता का जश्न मनाया है। इन निजी कम्पनी ने मई में पहली बार ड्रैगन अंतरिक्ष यान को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र पर भेजने में सफलता हासिल की। उसके बाद अक्टूबर में इसने दूसरी सफल लांचिंग की और कक्षा में भ्रमण कर रही प्रयोगशाला को सामग्री की आपूर्ति की।

पृथ्वी का वाह्यग्रह :
पृथ्वी के आकार का एक चट्टानी, खुरदुरा वाह्यग्रह, अल्फा सेंचुरी बी तारे के चारों ओर चक्कर काटता है। अक्टूबर में प्रकाश में आया यह ग्रह पृथ्वी से मात्र 4.4 प्रकाश वर्ष दूर है। एक टीम ने हाई एकुरेसी रेडियल विलॉसिटी प्लैनेट सर्चर के इस्तेमाल के जरिए अल्फा सेंचुरी बी पर इस ग्रह के लघु, गुरुत्वीय आकर्षणों का पता लगाने के बाद इस ग्रह को ढूढ़ा।

चिम्पांजी पर आक्रामक अनुसंधान का अंत :
दशकों से चिम्पांजियों पर हो रहा आक्रामक अनुसंधान, अमेरिका में चिकित्सा विज्ञान की चेतना पर छाया रहा है। मनुष्य से साम्य रखने वाला यह जीव मनुष्य की ही तरह सोचने ओर महसूस करने में सक्षम है। फिर भी हजारों की संख्या में इस जीव को क्रूरता के साथ बंधक बनाकर रखा गया, इसके साथ ऐसे प्रयोग किए गए जिसे कोई क्रूरतम व्यक्ति भी किसी मनुष्य के साथ नहीं कर सकेगा। हालांकि हर दूसरे देश ने चिम्पांजी आक्रामक अनुसंधान को प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन अमेरिका में यह जारी था। लेकिन 2011 के अंत में चिकित्सा संस्थान द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने घोषणा की कि अक्रामक अनुसंधान न केवल क्रूर है, बल्कि बिल्कुल अनावश्यक भी है।

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