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राजस्थान की सैर, मिलेगी ठंड से राहत

शुभा दुबे First Published:04-01-2013 12:40:29 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
राजस्थान की सैर, मिलेगी ठंड से राहत

दिल्ली की ठिठुराने वाली सर्दी से दूर राहत पाना हो तो मेरे हिसाब से राजस्थान से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती। गर्मियों में जला देने वाला यहां का मौसम सर्दियों के दौरान बेहद खुशगवार रहता है। सर्दियों के दौरान मैं यहां की एक न एक यात्रा तो कर ही लेती हूं फिर चाहे वह दो दिन की हो या फिर एक हफ्ते की। यूं तो मुझे राजस्थान पूरा ही पसंद है लेकिन कुछ यात्राएं ऐसी हैं जो बेहद यादगार हैं। इन में से एक है चित्तौड़गढ़, उदयपुर और माउंट आबू की यात्रा।

इस यात्रा के दौरान मैंने राजस्थान की संस्कृति और रंग को काफी करीब से देखा। इस सफर में हमारी पहली मंजिल चित्तौड़गढ़ था। दिल्ली से चित्तौड़ 570 किलोमीटर दूर है और यहां ट्रेन से भी जाया जा सकता है लेकिन हमने अपनी गाड़ी से जाने का मन बनाया। हम सुबह 5 बजे घर से निकले और एन एच 8 पर पहुंचे और खाते-पीते एन एच 79 के जरिए करीब 9 घंटों में हम चित्तौड़ पहुंचे। यहां पहुंचते ही हमने सबसे पहले अपने ठहरने का इंतजाम किया क्योंकि सर्दियों के दौरान राजस्थान सैलानियों की पसंदीदा जगह बन जाता है। शाम होने के कारण हम ज्यादा चीजें तो देख न सके लेकिन हमने चित्तौड़ के किले में होने वाले लाइट एंड साउंड शो का लुत्फ जरूर उठाया। रानी पद्मिनी, महाराजा रतन सिंह, राणा कुंभा से जुड़ी कहानियों ने मुझे राजपूताना के उस पहलू से रू -ब-रू करवाया जिन्हें मैंने अब तक बस किताबों में ही पढ़ा था। एक हसीन शाम के बाद हमने अपने होटल में जाकर आराम किया। दूसरे दिन सुबह मैं चित्तौड़ के इतिहास को और करीब से जानने के लिए तैयार थी। नाश्ता करके हम चित्तौड़ के किले के लिए निकल पड़े। चित्तौड़ का किला यूं तो खंडहर जैसा ही है लेकिन इसमें बसी राजपूतों की ताकत और उनके दृढ़ विचारों को मैं महसूस कर पा रही थी।

इसके बाद हमने विजय स्तंभ देखा जिसे महाराणा कुंभा ने मोहम्मद खिलजी पर अपनी जीत के बाद बनवाया था। विजय स्तंभ से हम रानी पद्मिनी के महल की ओर बढ़े। चित्तौड़ में हम और भी कई जगह गए और करीब 4 बजे हम उदयपुर के लिए रवाना हुए। 130 किलोमीटर की दूरी हमने करीब 3 घंटे में पूरी की। उदयपुर राजस्थान के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है। यहां पहुंचने के बाद हम शाम को मार्केट में घूमे और राजस्थान की कुछ मशहूर चीजों की खरीदारी की। रात में हमने दाल बाटी चूर्मा के जायके के साथ अपने दिन का अंत किया।

सुबह उठे तो मुझमें घूमने की एक नई ऊर्जा थी। अपने होटल से निकल कर हम सबसे पहले पिचौला लेक पर बने सिटी पैलेस गए जिसे महाराणा उदय सिंह ने बनवाया था। लेक पिचौल पर एक और महल बना है जिसे महाराजा जगत सिंह ने बनवाया था। जगमंदिर के नाम से मशहूर इस पैलेस के बारे में मैंने सुना था कि शाहजहां ने ताजमहल बनाते वक्त इस महल से भी प्रेरणा ली थी। दोपहर का खाना खाने के लिए हमने लेक पैलेस को चुना। पिचौला लेक के बीच बने इस महल को अब पांच सितारा होटल बना दिया गया है। तालाब में पड़ती लेक पैलेस की परछाईं ने मुझे इसकी खूबसूरती का दीवाना सा बना दिया था। मेरे लिए यहां आने का मकसद खाना खाने से ज्यादा उस खूबसूरती का हिस्सा बनना था जिसे देखने के लिए लोग पूरी दुनिया से आते हैं। लेक पैलेस के लजीज खाने से हमने उदयपुर का सफर खत्म किया और माउंट आबू के लिए निकल पड़े।
उदयपुर से माउंट आबू करीब 170 किलोमीटर है और यह दूरी हमने करीब तीन घंटे में पूरी की। माउंट आबू राजस्थान का इकलौता हिलस्टेशन है। जब तक हम यहां पहुंचे शाम हो चुकी थी और हम जिस सर्दी को दिल्ली में छोड़ कर आए थे उसका एहसास मुझे एक बार फिर हुआ। माउंट आबू पहुंच कर हमने आरटीडीसी के होटल में चेक इन किया। यहां हमने पहले से ही बुकिंग करवाई हुई थी।

माउंट आबू में रात बेहद ठंडी थी लेकिन रात को पहाड़ पर जगमगाती रोशनी दिल को एक सुकून भरा एहसास दे रही थी। यहां से निकल कर हम नक्की लेक के करीब स्थित टोड रॉक की ओर गए। इस बड़े से पत्थर का आकार ऐसा है कि उसे देख कर मुझे लगा मानो यह एक टोड है जो नक्की लेक में कूदने वाला है। प्रकृति का यह एक अनोखा जादू है। यहां हमें शाम होने लगी थी। और पास में ही था सनसेट प्वाइंट। राजस्थान की इस मनमोहक और शाही यात्रा का अंत करने का सबसे मनोहर तरीका था सूर्यास्त का नजारा। इस सफर की हर एक याद समाती जा रही थी और वह आज भी मेरे साथ है।

दिल्ली से चित्तौड़गढ़: 565 किलोमीटर
चित्तौड़गढ़ से उदयपुर: 115 किलामीटर
उदयपुर से माउंट आबू: 164 किलोमीटर
निकटतम हवाईअड्डा (उदयपुर)
निकटतम रेलवे स्टेशन
चित्तौड़गढ़, उदयपुर, आबू रोड

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