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अध्यापकों का शोषण

देश भर में निजी स्कूलों के शिक्षकों का काफी शोषण किया जाता है। शोचनीय यह है कि जिन अध्यापकों की वजह से ये स्कूल चलते हैं, उन्हें वेतन काफी कम मिलता है, जबकि वे अपनी पूरी जिंदगी उस स्कूल को संवारने में लगा देते हैं। खासतौर से शिक्षिकाओं की मजबूरी का खूब फायदा उठाया जाता है। ध्यान देने की बात यह भी है कि सरकारी स्कूलों में जहां पढ़ाई के नाम पर खानापूर्ति होती है, वहीं निजी स्कूलों में सुबह से लेकर शाम तक क्लास चलती है। शिक्षकों को लगातार खड़े रहना पड़ता है। इसलिए सरकार से यह अनुरोध है कि यदि वह वास्तव में शिक्षा का स्तर सुधारना चाहती है, तो निजी स्कूलों की भी सुध ले और सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति-योग्यता में निजी स्कूलों में कुछ वर्षों तक पढ़ाने का अनुभव अनिवार्य कर दे।
संजीव त्यागी, मेरठ

सरकारी स्कूलों की बदहाली
स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है, मगर आज इन मंदिरों का खूब व्यवसायीकरण हो गया है। पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में दाखिले में 1.3 करोड़ की कमी आई है, जबकि निजी स्कूलों में 1.75 करोड़ नए बच्चों ने दाखिले लिए हैं। ये आंकड़े देश के सरकारी स्कूलों की दुर्दशा बताने के लिए पर्याप्त हैं। इन स्कूलों की बदहाली के लिए जिम्मेदार सरकार ही है। उचित प्रबंधन न होने के कारण छात्र निजी स्कूलों में जाने को बाध्य हैं। क्या सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करने की पहल नहीं की जा सकती?
अनुपमा अग्रवाल, आगरा रोड, अलीगढ़

ऐसा हो विकास 
विकास एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे हम रोक नहीं सकते। मगर क्या विकास पर्यावरण को नुकसान किए बिना संभव नहीं है? मध्य प्रदेश में 77 शहरों के 744 उद्योगों को हरी झंडी मिल गई है। यह सही है कि इन उद्योगों से नए रोजगार पैदा होंगे, पर इनकी वजह से पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचेगा। समस्या दरअसल यह है कि लगातार जनसंख्या वृद्धि से हमें बसने के लिए और अधिक भूमि की जरूरत पड़ रही है। इसी कारण पिछले कुछ दशकों से जंगलों का अंधाधुंध दोहन भी हो रहा है। नतीजतन, आज धरती इतनी गरम हो गई है कि सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। विकास का मतलब सिर्फ शहरीकरण या औद्योगिकीकरण नहीं होता है। सही मायने में विकास वह है, जो सतत हो, निरंतर हो। उसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना मानव की उन्नति का खाका खिंचा हो। सतत विकास के लिए यूडीपीएफआई ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं, हमें उसके अनुसार काम करना चाहिए। जैसे भोपल जैसे बड़े शहरों में संतुलित पर्यावरण के लिए भूमि का 35-40 प्रतिशत हिस्सा लोगों के रहने के लिए, 10-12 प्रतिशत औद्योगिकीकरण के लिए, 12-14 प्रतिशत हिस्सा यातायात के काम में और कुछ हिस्सा भविष्य में निर्माण-कार्यों के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। जाहिर है कि यदि हम सोच-विचारकर विकास-कार्य करें, तो पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना भी तरक्की कर सकते हैं और अपना भविष्य गढ़ सकते हैं।
महिमा सिंह, उज्जैन

मतदान का मजाक
अभी हाल ही में संपन्न हुए श्रीनगर लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में मात्र 7.14 फीसदी मतदान हुआ, जबकि यहां पर 12.61 लाख मतदाता पंजीकृत हैं। विजयी उम्मीदवार को मात्र 48.5 हजार मतों से जन-प्रतिनिधि होने का गौरव मिल गया है। यह वाकई विशेषज्ञों के लिए विचार करने का मसला है। मेरा मानना है कि जिस प्रकार संसद की कार्यवाही के लिए सदस्यों की न्यूनतम उपस्थिति की एक सीमा जरूरी है, वैसे ही क्या यह व्यवस्था निर्वाचन के लिए भी नहीं की जा सकती? यानी न्यूनतम मतदान की एक सीमा तय हो, तभी उस क्षेत्र का चुनाव सफल घोषित किया जाए। लोकतंत्र के सबसे बड़े महोत्सव में ऐसा कुछ नियम तो बनना ही चाहिए।
सत्यप्रकाश आर्य, सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा

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  • Web Title:private school teacher exploitation