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जहर-डंक और जाल ही है मकड़ी का संसार

रजनी अरोड़ा First Published:17-12-2012 12:46:07 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
जहर-डंक और जाल ही है मकड़ी का संसार

स्पाइडर मैन कितना ताकतवर है और पलक झपकते ही दुश्मनों को मार गिराता है। पर असल में मकडियां क्या ऐसी ही होती हैं या उससे अलग, चलो जानते हैं रजनी अरोड़ा से

कुछ ऐसा होता है मकड़ी का शरीर...
मकड़ी की दुनिया में करीब तीस हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। आठ पैरों वाले इन मांसाहारी कीटों की विभिन्न प्रजातियों का आकार .5 मिलीमीटर से लेकर 9 सेंटीमीटर तक होता है। मकड़ी का शरीर दो भागों में बंटा होता है- एक, काइटन से बना सिर और वक्ष से जुडा सामने का हिस्सा, जो काफी कठोर होता है और दूसरा, एक ट्यूब से जुड़ा नरम पेट का पिछला हिस्सा, जिसे ओपिसथोसोमा कहा जाता है। 6 आंखों वाली कुछ मकडियों को छोड़कर अधिकांश की 8 आंखें होती हैं। मकड़ी के कान नहीं होते। ध्वनि तरंगों को सुनने और महसूस करने का कार्य वह अपने पैरों पर मौजूद छोटे-छोटे बालों की मदद से करती है, जिन्हें थ्रिचोबोट्रिया कहा जाता है। दो जबड़े और मुख के पास जहर-ग्रंथि युक्त डंक होता है। इनका जहर मूलत: छोटे-छोटे कीट-पतंगों पर ही प्रभावी होता है। मकडियों की हार्टबीट प्रति मिनट 30 से 70 आवृत्ति होती है। जब मकड़ी परेशान होती है या थक जाती है तो उसकी धड़कन प्रति मिनट 200 बार हो जाती है।

जाले बुनने में होती हैं माहिर...
मकडियां चाहे किसी भी प्रजाति की क्यों न हों, सभी में बारीक रेशमी धागे बनाने की क्षमता होती है, जिससे वे वेब या जाला बुनती हैं। मकडियों के पेट में सात प्रकार की रेशम उत्पादक ग्रंथियां (सिल्क स्पिनर ग्लेंड्स) पाई जाती हैं, जिनसे निकलने वाले लिक्विड फाइबर प्रोटीन के रूप में रेशम बनता है। यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक मकडियों में ये सातों ग्रंथियां होती हैं। ये ग्रंथियां मकड़ी के पिछले हिस्से में स्थित सिल्क स्पाइनर अंगों में खुलती हैं, जिनमें अनेक वेन्स होती हैं। रेशम-ग्रंथियों से निकलने वाला लिक्विड प्रोटीन इन वेन्स में पॉलीमराइज होकर ठोस रेशमी धागे में बदल जाता है। ये सिल्क धागे चिपचिपे होते हैं। इन पर जब छोटे-छोटे कीट-पतंगे बैठते हैं, तो वे सिल्क धागों से चिपक जाते हैं और मकड़ी का शिकार बन जाते हैं। इसी धागे से मकड़ी बहुत निपुणता से जाल बुनती है।

आमतौर पर ये जाल
गोलाकार होते हैं। इसके लिए मकड़ी सबसे पहले आधारभूत धागा बनाती है, जो दूसरे सिल्क धागों से काफी मोटा और मजबूत होता है। इसका एक सिरा वह हवा में छोड़ देती है, जब तक कि वह किसी ठोस आधार पर चिपक न जाए। तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि इस वेब के रेशम को मकडियों एक दिन बाद खा लेती हैं। हवा और धूल के कारण इनका चिपचिपापन खत्म होने लगता है, जिससे यह वेब शिकार फंसाने के काम नहीं आता।

ऐसे करती हैं शिकार...
मकडियां रेशमी धागे और जाल बनाने में ही कुशल नहीं होतीं, बल्कि इनमें फंसे कीट-पतंगों का शिकार करने में भी दक्ष होती हैं। इसके लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाती हैं। कभी ये उनके पीछे दौड़ती हैं तो कभी घात लगाकर इंतजार करती हैं। शिकार के चिपचिपे धागों में फंसने पर जाल में होने वाले कंपन को मकड़ी महसूस करती है। शिकार को वह जहर-डंक से मार डालती है और उसके आसपास रेशमी धागों का जाल बुनकर उसे निष्क्रिय कर देती है। मकडियां शिकार के चारों ओर अपने पेप्सिन एंजाइम का स्रव करके सारे पोषक तत्वों को लिक्विड रूप में बदल देती हैं। रस चूस कर बाहरी शरीर ऐसे ही छोड़ देती हैं।

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