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बिहार की एक नई उलझन

रामचंद्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार First Published:12-12-2014 08:38:07 PMLast Updated:12-12-2014 08:38:07 PM

जब मैंने जनता परिवार बनाने के लिए मिलते हुए राजनेताओं की तस्वीर देखी, तो मेरा दिल डूब गया। इस तस्वीर में जो लोग थे, उनमें समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, जनता दल सेक्युलर के एचडी देवगौड़ा, इंडियन नेशनल लोकदल के अभय चौटाला और जनता दल (यू) के नीतीश कुमार शामिल थे। इन पांचों नेताओं में नीतीश कुमार तीन तरह से अलग हैं। पहला, न उनके पिता, न पत्नी, न बेटा, न भाई राजनीति में हैं। दूसरा, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं। तीसरा, इन पांचों में वह एकमात्र नेता हैं, जो अपने राज्य में अच्छे प्रशासन के लिए प्रयत्नशील रहे। नीतीश कुमार साल 2005 में जब मुख्यमंत्री बने, तब बिहार देश का सबसे खराब प्रशासन वाला राज्य था। वहां कानून व व्यवस्था की मशीनरी पूरी तरह ध्वस्त थी। हत्या और अपहरण आम था। पटना में शाम के बाद सड़कों पर चलना असुरक्षित था। कई जिलों में तो दिन में भी वाहन चलाना सुरक्षित नहीं था। लालू यादव और उनके परिवार के 15 साल के शासन में राज्य की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई थी और सरकारी कर्मचारी हिम्मत हार चुके थे। उस दौर में जिन्हें फायदा हुआ, उनमें राजद के मंत्री, विधायक और उनके रिश्तेदार ही थे। लालू के बरक्स नीतीश कुमार के खिलाफ हेरफेर का कोई आरोप नहीं था, उन्हें मेहनती माना जाता था और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वह ठीक-ठाक रेल मंत्री थे।

भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर जद (यू) ने विधानसभा चुनाव जीता और गुंडाराज की जगह शांति, स्थिरता और विकास लाने का वायदा किया। बिहार में नवंबर 2005 में राजग की सरकार बनी, जिसमें नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे। ये दोनों लोग जेपी आंदोलन में साथ-साथ थे। इनके नेतृत्व में बिहार धीरे-धीरे बदलने लगा। सबसे पहला परिवर्तन कानून-व्यवस्था में हुआ। अब महिलाएं पटना की सड़कों पर सुरक्षित चल सकती थीं और ग्रामीण सड़कों पर किसी भी वक्त वाहन चलाया जा सकता था। अगला बड़ा परिवर्तन शिक्षा के क्षेत्र में हुआ। हाई स्कूल की लड़कियों को साइकिल देने की योजना की वजह से ज्यादा लड़कियां पढ़ने लगी। शिक्षा विभाग के लिए सबसे अच्छे अफसरों को चुना गया। एक स्वयंसेवी संस्था प्रथम के साथ मिलकर सरकार ने शिक्षा की निगरानी का अच्छा इंतजाम किया। नई सरकार ने बुनियादी ढांचा बेहतर बनाने की भी कोशिश की। जिलों और तहसीलों को जोड़ने के लिए नई सड़कें और पुल बनाए गए।

सामाजिक परिस्थिति भी बेहतर होने लगी। जाति और संप्रदाय के आधार पर झगड़े कम हो गए। मुस्लिम, दलित और महिलाएं बिहार में खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगे। नीतीश कुमार और सुशील मोदी, दोनों का राज्य में व्यापक सम्मान और विश्वसनीयता थी। इसीलिए 2010 के चुनाव में जद (यू)-भाजपा गठबंधन को 80 प्रतिशत सीटें मिलीं। कई ऐसे बिहारी जो राज्य को छोड़कर चले गए थे, वे वापस आने लगे। उम्मीद बनने लगी कि राज्य में अब औद्योगिक विकास भी हो पाएगा। यह गठबंधन रहा होता, तो तीसरी बार भी जीत जाता, लेकिन 2013 में चीजें बदलने लगीं। इसका कारण देश के दूसरे छोर के एक राजनेता था। नीतीश कुमार की बिहारी मोदी से तो दोस्ती थी, लेकिन वह गुजराती मोदी को पसंद नहीं करते थे। यह नापसंदगी कुछ व्यक्तिगत थी और राजनीतिक भी। नीतीश कुमार को लगता था कि नरेंद्र मोदी अहंकारी और हावी होने वाले राजनेता हैं।

जैसा कि उनके बिहार में बाढ़ राहत के लिए दिए गए पांच करोड़ रुपयों से जाहिर हुआ, जिन्हें नीतीश कुमार ने तुरंत लौटा दिया। इसके अलावा, उन्हें लग रहा था कि 2002 के गुजरात दंगों की वजहों से नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकों में अलोकप्रिय हो गए हैं और इसका असर जद (यू) के मुस्लिम वोटरों पर पड़ेगा। इसी दौरान नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी में ज्यादा ताकतवर होते गए। मार्च में उन्हें भाजपा के केंद्रीय संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया, जून में उन्हें चुनाव समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। तभी नीतीश कुमार ने घोषणा की कि जद (यू) भाजपा के साथ अपना गठबंधन तोड़ रही है। भाजपा पर इसका कोई असर नहीं हुआ और सितंबर में नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित कर दिए गए। नीतीश कुमार का फैसला संभवत: दो समीकरणों पर आधारित था। पहला यह कि आठ साल के राज में उनका और उनकी पार्टी का स्वतंत्र आधार बन चुका है।

दूसरा, नरेंद्र मोदी के साथ मिलने से मुसलमानों का बड़ा हिस्सा लालू यादव के साथ चला जाएगा। सन 2014 के आम चुनाव में यह साफ हो गया कि उनके दोनों समीकरण गलत सिद्ध हो गए। जद (यू) ने सिर्फ दो सीटों पर सफलता पाई, जबकि भाजपा अपने सहयोगियों के साथ 31 सीटें ले गई। नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और अपने सहयोगी जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनवा दिया। लगभग छह महीने नीतीश कुमार कहीं नजर नहीं आए और उसके बाद पिछले दिनों वह मुलायम, लालू और अन्य लोगों की सोहबत में प्रकट हुए। पीछे मुड़कर देखने से यह लगता है कि राजग छोड़ने का नीतीश कुमार का फैसला एक राजनीतिक गणित की गलती थी, लेकिन यह कहा जा सकता है कि सपा, राजद, जनता दल-सेक्युलर और इंडियन नेशनल लोकदल के साथ मिलने का उनका फैसला राजनीतिक और नैतिक भूल भी है। अपनी ईमानदारी, अच्छे प्रशासन के लिए मशहूर नीतीश कुमार अब ऐसे लोगों के साथ हैं, जो परिवारवाद, व्यापक भ्रष्टाचार और अपने राज्यों के विकास के प्रति भयानक लापरवाही के लिए जाने जाते हैं।

इस सवाल का राजनीतिक पक्ष यह है कि युवा मतदाता अब पहचान से ज्यादा विकास की राजनीति में यकीन रखते हैं और मुमकिन है कि भविष्य में मुलायम या लालू शायद अपने राज्यों में भी अपनी जगह न बचाए रख पाएं। यह सही है कि जबरदस्त हार के बाद नीतीश कुमार के पास ज्यादा राजनीतिक विकल्प नहीं थे। कांग्रेस के साथ जाना किसी भी तरह फायदेमंद नहीं था। वह आम आदमी पार्टी के साथ भी नहीं जा सकते। उनके समर्थक कह सकते हैं कि उनके पास इस जनता परिवार में शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं था। लेकिन एक विकल्प शायद बचा था कि वह पार्टी की राजनीति छोड़कर जनता की राजनीति करने लगते, जैसे जयप्रकाश नारायण ने किया था। अब यह समझ में नहीं आता, जो ऊर्जा और विश्वसनीयता नीतीश कुमार की सरकार में दिखी थी, उसे वापस कैसे लाया जा सकता है? नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जुगलबंदी ने जो कुछ कर दिखाया, उसका विकल्प मिलना मुश्किल है।

अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती, तो सुशील मोदी अपनी पार्टी के संकीर्ण तत्वों से घिरे रहेंगे। अगर जनता परिवार जीता, तो नीतीश को लालू परिवार को संतुष्ट करने में लग जाना पड़ेगा। बिहार के एक विख्यात शिक्षाविद ने मुझे चिट्ठी लिखी कि बिहार में जो हो रहा है, वह भयानक है, जो चीजें ठीक थीं, वे तेजी से बरबाद हो रही हैं। ऐसा लगता है कि स्थिति बद से बदतर होने की तरफ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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