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अकेले रचनाकार नहीं जिम्मेदार

First Published:27-03-2011 12:23:01 AMLast Updated:27-03-2011 12:28:45 AM

राठीजी, आपको प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पुरस्कार पाकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
मुझे पहले कविता संग्रह ‘बाहर-भीतर’ के लिए 1980 में ओमप्रकाश साहित्य सम्मान मिला था। थोड़ा आश्चर्य तब भी हुआ था। अब चौथे संग्रह ‘अंत के संशय’ के लिए बिहारी पुरस्कार मिला तो इस सूचना से भी चकित ही हुआ।..पर कुल मिलाकर अच्छा लगा।..शुरू में पुरस्कार उत्साहवर्धक होता है, पर यह खतरा जरूर रहता है कि रचनाकार उसी समय आत्मतुष्ट न हो जाए और सार्थक और नया आविष्कृत करने से विमुख हो जाए।

साहित्य से लगाव के आपके सामान्य नजरिए क्या हैं?
पेशा तो मेरा पत्रकारिता रहा है लेकिन असली रुचि शुरू से ही साहित्य और कुछ दूसरी कलाओं में बनी हुई है। कैसा भी वक्त हो, उजला या अंधेरा कविता और दूसरी विधाओं की पुस्तकों का पठन-पाठन कुछ अजीब ढंग से तसल्ली देता है। रचना की दुनिया अधिकांशत: जीने की और जीवन को कुछ अधिक सुंदर बनाने की प्रेरणा गुपचुप ढंग से देती रहती है। हम जानते हैं कि साहित्य और कलाओं ने अपने हजारों साल के अस्तित्व और घोषित-अघोषित मंतव्य के बावजूद मनुष्य को या उसके समाज को बेहतर नहीं बनाया है। श्रेष्ठ मूल्यों और मानवीयता या इंसानियत के संस्कार डालने की तमाम चेष्टाओं के बावजूद मनुष्य की पशुता के सामने साहित्य व्यर्थ लगने लगता है।

इस व्यर्थताबोध के बावजूद साहित्य बचा हुआ कैसे है?
इन सबके बावजूद साहित्य अगर रचा जा रहा है तो इसीलिए कि मनुष्य ने हार नहीं मानी है। हर तरह की पराजय के बावजूद जीवन को सुंदर, मानवीय और बेहतर बनाने का कोई और उपाय मनुष्य के पास नहीं है। एकांत साधना होने के बावजूद यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य और कलाओं के लपेटे में जीवन और समाज का हर पक्ष किसी न किसी मात्र में अवश्य रहता है। आज भी भरपूर साहित्य लिखा जा रहा है। 

उपन्यास की विधा में दुनिया भर में एक नई जान आ गई है। जीवनी और आत्मकथा जैसी विधाएं नए-नए ढंग से पाठकों और श्रोताओं को अपनी गिरफ्त में ले रही है। यह जरूर है कि आज जो कविता लिखी जा रही है, शायद उस तरह का संतोष नहीं दे पा रही, जैसी की अपेक्षा हम सबकी है। कारण अनेक हो सकते हैं। परिवर्तन की रफ्तार पिछले 20 वर्षो में बेहद तेज रही है।

जो कुछ भी प्रतिष्ठित और प्रचलित था, वह सब उलट-पलट गया है। हर पल कुछ नया आविष्कार हो रहा है। विज्ञान और टेकनोलॉजी में तो है ही। चिंतन, सिद्धांत, मनोविश्लेषण इत्यादि तमाम क्षेत्रों में भीषण शास्त्रर्थ छिड़ा हुआ है। लगभग हर रोज मनुष्य को नए सिरे से परिभाषित करने की चेष्टाएं हो रही हैं। अंग्रेजी की चमक-दमक के कारण जीवन के तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसकी अपरिहार्यता बढ़ती जा रही है। इस वजह से हिन्दी जैसी हमारी अपनी भाषाओं के प्रति हम सबका रवैया बेहद उपेक्षापूर्ण और चलताऊ हो चला है।

साहित्य का माध्यम भाषा ही तो है। यदि भाषा का परिमाजर्न और पुनर्जीवन निरंतर न हो तो कोई भी अभिव्यक्ति बासी, एकरस या अर्थहीन ही मालूम होगी। हिन्दी भाषा पर आज पचासों तरह के दबाव हैं। उन दबावों के प्रतिरोध का लक्षण हमें दिखाई नहीं दे रहा। बेशक निजी स्तर पर प्रतिभाशाली और समर्थ रचनाकार भाषा के मोर्चे पर डटे रहे हैं और आगे भी रहेंगे। लेकिन वे तभी व्यापक रूप से प्रभाव दिखा पाएंगे जब हमारी शिक्षा प्रणाली संचार के माध्यम, सरकारी नीतियां और नागरिक समाज के प्रयत्न अपनी भाषा के पक्ष में सुदृढ़ कदम उठाएं।

भाषा के सवाल को आप किस तरह देखते हैं?
हमें देखना होगा कि हमें अपनी भाषा से हमें प्रेम है या नहीं? यदि नहीं है और जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तो हिन्दी भाषा को अपंग, गूंगा या लुप्त करने से दुनिया की कोई भी ताकत उसे बचा नहीं सकती। इसका विलोम भी सच है। यानी, अगर हम अपनी भाषा से प्रेम करें और हर तरह से उसे बरतने तथा पुष्ट करने की चेष्टा करें तो काफी कुछ उसे बचाया जा सकता है। और बचाने का मतलब यही है कि हर क्षेत्र में हिन्दी की अभिव्यक्ति अपने उत्कृष्टतम रूप में सामने आए।

थोड़ी देर पूर्व आपने कहा कि पत्रकारिता आपका पेशा रहा है। पत्रकारिता की धुन कहां से सवार हुई? 
इलाहाबाद में जब मैं एमए फाइनल में था, उसी समय मुझे पत्रकारिता की फेलोशिप मिल गई। बुदापेस्त की। वहां मैंने पत्रकारिता का डिप्लोमा लिया। 1967-68 की बात है। लौटा तो पहला काम किया दिल्ली से निकलने वाले ‘साप्ताहिक जनयुग’ में। यह सीपीआई का था। सोल्जेनित्सिन के मसले पर सीपीआई के तत्कालीन महासचिव राजेश्वर राव से बहस हुई मेरी। लिखित। इसी मसले पर मैंने जनयुग छोड़ा।

एक साल फ्रीलांसिंग की। उसके बाद ‘प्रतिपक्ष’ में आया। सहायक संपादक बनकर। संपादक थे कमलेशजी। उनके बाद मैं ही संपादक हो गया था। फिर आपातकाल में नजरबंद हुआ। साढ़े सत्रह महीने दिल्ली और जयपुर की जेलों में रहा। जब छूटा तो दो ढाई साल तक फ्रीलांसिंग की। उसी दौर में एमेनेस्टी इंटरनेशनल में सक्रिय हुआ। फिर सीएसडीएस में नौकरी की। वहां मैं अंग्रेजी में चला गया। अल्टरनेटिव और चाइना रिपोर्ट पत्रिकाओं में। वहां 12-13 साल रहा। फिर ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में आ गया, जहां 2003 तक..सेवामुक्त होने तक रहा। यह है मेरी पत्रकारिता का हिसाब किताब।

आपकी वैचारिक यात्रा में साम्यवाद और समाजवाद दोनों मौजूद रहे हैं। इस सफर के बारे में कुछ बताएं?
समाजवाद और साम्यवाद का अध्ययन-मनन साथ चला। कुल दिलचस्पी यही थी कि पढ़-लिखकर हम समाज को क्या दे सकते। पत्रकारिता का माध्यम ऐसा था कि जिसके द्वारा हम वह ऋण चुका सकते थे, जो समाज का हम पर है यानी, शिक्षा-दीक्षा और जीवित बनाए रखने में समाज का योगदान। आज यह गए-गुजरे जमाने की बात जैसी लग सकती है, लेकिन अब भी मेरी मान्यता है कि अपने नवीनतम माध्यमों के साथ पत्रकारिता, सामाजिक एवं अन्य परिवर्तनों के लिए कारगर साधन है। समाजवाद और साम्यवाद के जो भी व्यावहारिक रूप हमारे सामने आए हैं, वे सब नाकाफी साबित हुए हैं। एकमात्र कारगर साधन लोकतंत्र ही मालूम होता है।

समाज निर्माण में या भ्रष्टाचार के खिलाफ अथवा नीति-निर्माण में रचनाकार की अव्वल और एक्टिविस्ट वाली भूमिका हो सकती है। आप क्या सोचते हैं?
दरअसल, यह समझना जरूरी है कि रचनाकार की अस्मिता केवल रचनाकार ही नहीं होती। जैसे मनुष्य होते हुए भी हम विश्व नागरिक या भारतीय या तमिल, बंगाली या स्त्री-पुरुष या हिन्दी-अंग्रेजी भाषी इत्यादि भी होते हैं। उसी तरह, ऐसे रचनाकारों की कमी नहीं है जिन्होंने हथियार उठाए या शांतिपूर्ण आंदोलन किए या तरह-तरह से सामाजिक- राजनीतिक आंदोलन में शरीक हुए।

आजादी के आंदोलन या संपूर्ण क्रांति आंदोलन में ही फणीश्वनाथ रेणु, नागार्जुन, शिवराम कारंत इत्यादि नाम हैं। महादेवी वर्मा जैसी नाम हैं जिन्होंने आपातकाल का मुखर विरोध किया। समाजवादी या लोहिया के नजदीक लोगों पर साम्यवादियों के काफी विचित्र आरोप होते थे, आज भी हैं। मैं खुद लोहियावादी या समाजवादी नहीं हूं। भले ही तमाम तरह की विचारधाराओं के श्रेष्ठ मंतव्यों से अपने आप को परिचित कराता रहा हूं। लेकिन विजयदेव नारायण साही, जो कि साहित्य में राजनीति के दखल के प्रबल विरोधी थे, अपने जीवन की एक दूसरी पहचान में, बहुत बड़े मजदूर नेता भी थे। रुचि परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार, रचनाकार की सामाजिक जीवन में अनेक भूमिकाएं हो सकती हैं।

इस समय साहित्य में प्रतिक्रिया का भाव अधिक दिखता है और संक्रमण भी..?
यह बिल्कुल सही है। आज एक कैजुअल एप्रोच दिखता है। कई रचनाकारों के लेखन में एकरूपता दिखती है। आपातकाल के पहले की बात है, धूमिल की कविता पर जितेंद्र कुमार से मेरी लंबी बहस यहीं दिल्ली में मोहन सिंह प्लेस में हुई थी, साही की कविता पर विष्णु खरे से बहस हुई थी। आज हम किसी पुस्तक या किसी रचनाकार के बारे में कम बातें करते हैं..। संक्रमण कहा आपने.. तो वास्तव में हर समय एक तरह से संक्रमण का ही समय होता है। कभी कभी बदलाव या संकट ज्यादा बड़े रूप में नजर आता है। साहित्य की जो कुछ निराशाजनक स्थिति आज है उसके लिए साहित्य या रचनाकार अकेला जिम्मेदार नहीं है। पिछले दो दशकों का बदलाव इतना तेज रौ या रफ्तार का रहा है कि शायद हममें से बहुत से लोग इसे जज्ब भी नहीं कर पाए हैं। कभी कभी लगता है हम सटीक सवाल भी नहीं उठा पाते, उत्तर देना तो दूर..। आधुनिकता के दौर की बड़ी खूबी थी कि हम कम से कम सवाल तो उठा पाते थे।

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