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तिवारी के खिलाफ पितृत्व मामले में रोजाना सुनवाई का आदेश

नई दिल्ली, एजेंसी First Published:07-01-2013 04:48:30 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
तिवारी के खिलाफ पितृत्व मामले में रोजाना सुनवाई का आदेश

वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी को एक युवक द्वारा अपना जैविक पिता बताये जाने से संबंधित मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज दिन-प्रतिदिन आधार पर सुनवाई का आदेश दिया। तिवारी ने मध्यस्थता के जरिये मामले को सुलझाने से इनकार कर दिया है।
   
न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा, स्थानीय आयुक्त को प्राथमिकता के साथ दिन-प्रतिदिन आधार पर सुनवाई करने का निर्देश दिया जाता है। यह निर्देश तब आया जब 88 वर्षीय तिवारी के वकील ने मध्यस्थता से अदालत के बाहर मामले को सुलक्षाने से इनकार कर दिया और कहा कि इस बात की संभावना है कि चिकित्सकीय साक्ष्य शत प्रतिशत सही नहीं हों।
   
न्यायमूर्ति मनमोहन ने सुनवाई के दौरान कहा, इस मामले को समाधान के लिए मध्यस्थता केंद्र ले जाना चाहिए क्योंकि डीएनए रिपोर्ट के रूप में चिकित्सकीय साक्ष्य स्पष्ट सुझाते हैं कि प्रतिवादी (तिवारी) याचिकाकर्ता (रोहित शेखर) के पिता हैं।
   
तिवारी के वकील बहर उल बरकी ने अदालत के सुक्षाव को स्वीकार नहीं किया और दलील दी कि उनके मुवक्किल मुकदमा लड़ना चाहेंगे क्योंकि वैज्ञानिक सबूतों को अंतिम नहीं कहा जा सकता। अदालत ने कहा कि यह लगभग निर्णायक हैं और ऐसा लगता है कि वह ऐसा (मध्यस्थता प्रक्रिया) नहीं करना चाहते।
   
अदालत ने सेवानिवृत्त अतिरिक्त जिला न्यायाधीश विमला माकन से मामले में साक्ष्यों को दर्ज करने के साथ दिऩ़ब़.दिन आधार पर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। माकन को मामले में स्थानीय आयुक्त नियुक्त किया गया है।
   
अदालत ने कहा कि स्थानीय आयुक्त द्वारा 21 जनवरी से कार्यवाही शुरू की जाएगी। इस बीच अदालत ने तिवारी को चार सप्ताह के भीतर 46000 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट देने को कहा, जो उन पर पूर्ववर्ती सुनवाई के दौरान हर्जाने के तौर पर लगाये गये हैं।
   
उच्च न्यायालय ने पिछले साल 27 जुलाई को मामले में डीएनए रिपोर्ट पढ़ी थी, जिसके मुताबिक तिवारी को शेखर का जैविक पिता दर्शाया गया था। उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश की पीठ ने डीएनए रिपोर्ट पढ़ी थी। इससे पहले एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के 19 जुलाई के फैसले के खिलाफ तिवारी की अपील को खारिज कर दिया था।
   
आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल तिवारी ने एकल न्यायाधीश को डीएनए रिपोर्ट को गोपनीय रखने की तथा मामले में बंद कमरे में कार्यवाही करने की गुहार लगाई थी। 

 
 
 
 
 
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