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भारत की विकास दर 7 प्रतिशत रहेगी: एडीबी

नई दिल्ली, एजेंसी First Published:11-04-2012 12:00:21 PMLast Updated:11-04-2012 12:03:22 PM
भारत की विकास दर 7 प्रतिशत रहेगी: एडीबी

एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने वर्ष 2012-13 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाते हुए कहा है कि मजबूत आर्थिक निष्पादन इस बात पर निर्भर करता है कि देश सुधारों के एजेंडे को किस मजबूती से आगे बढ़ाता है और निवेश में आडे आ रहे मुद्दों को कैसे सुलझाया जाता है।

बैंक ने अपने सालाना प्रकाशन एशियाई विकास परिदृश्य (एडीओ) में यह निष्कर्ष निकाला है। इसमें कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि वित्त वर्ष 2012-13 में 7.0 प्रतिशत तथा वित्त वर्ष 2013-14 में 7.5 प्रतिशत रहनी चाहिए जो 2011-12 में घटकर 6.9 प्रतिशत रह गई थी जबकि इससे पहले साल में यह 8.4 प्रतिशत थी।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है जबकि भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान अगले सप्ताह आएगा।

एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री छांगयोंग री ने कहा कि लगातार उंची मुद्रास्फीति तथा नीतिगत दरों में वृद्धि के बाद मौद्रिक नीति में संभावित नरमी से आने वाले वर्षों में निवेश बढाने में मदद मिली सकती है लेकिन जमीन खरीद तथा पर्यावरणीय नियम संबंधी बाधाओं को दूर किए जाने तक इसका असर सीमित रहने की संभावना है।

छांगयोंग ने कहा कि जमीन खरीद तथा पर्यावरणीय नियम के मुद्दे घरेलू तथा विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित कर रहे हैं। एडीओ में कहा गया है कि भारत के निवेश माहौल में सुधार के लिए अनेक विधेयक व उपाय संसद में पेश की गई लेकिन तात्कालिक सुधारों को लेकर पर्याप्त सहमति के अभाव में इनमें अधिक प्रगति नहीं हुई है।

रपट में सड़क निर्माण तथा बिजली परियोजनाओं को मंजूरी में तेजी को सकारात्मक संकेत बताया गया लेकिन कहा गया है कि निवेश के स्तर में अच्छी खासी वृद्धि के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है।

इसमें 2011-12 के बारे में कहा गया है कि निर्यात में गिरावट, उपभोक्ता खर्च में कमी तथा निवेश में नरमी के कारण वृद्धि दर घटी। इस दौरान औद्योगिक वृद्धि दर घटकर 3.9 प्रतिशत रह गई जो दशक में सबसे कम है हालांकि सेवा क्षेत्र ने अच्छा प्रदर्शन किया।

एडीबी ने मुद्रास्फीति के बारे में कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लगातार 13 बार नीतिगत दर में बढोतरी के बाद साल के अंतिम दौर में इसमें नरमी का रख रहा। हालांकि मांग में कमी के कारण निर्यात में पहली छमाही की तेजी बाद में कायम नहीं रह सकी।

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