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जलियांवाला बाग हत्याकांड...जब अंग्रेजों ने खेली खून की होली

नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान First Published:13-04-2013 12:12:48 PMLast Updated:13-04-2013 12:45:33 PM
जलियांवाला बाग हत्याकांड...जब अंग्रेजों ने खेली खून की होली

13 अप्रैल के दिन के साथ बैसाखी के उल्लास के साथ ही जलियांवाला बाग हत्याकांड की बेहद दर्दनाक यादें भी जुड़ी हैं, जब गोरी हुकूमत के नुमाइंदे जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर सैकड़ों निर्दोष देशभक्तों को मौत की नींद सुला दिया।

इतिहास में 13 अप्रैल 1919 की जलियांवाला बाग की घटना विश्व के बड़े नरसंहारों में से एक के रूप में दर्ज है, जब बैसाखी के पावन पर्व पर अंग्रेजों ने हिन्दुस्तानियों के खून से होली खेली।

1919 वह वर्ष था, जब भारत के लोग आज़ादी को पाने के लिए नई हिम्मत और एकता का उदाहरण पेश कर रहे थे। अंग्रेजों ने रोलेट एक्ट लागू किया था, जिसने आग में घी का काम किया और आज़ादी की ज्‍वाला को और भड़का दिया।

पंजाब में हिन्दू, सिख और मुस्लिम समुदाय की एकता अंग्रेजों को देखे नहीं सुहा रही थी। अंग्रेज किसी भी कीमत पर इस एकता को तोड़ने और भारतीय लोगों के मन में से निकल चुके डर को फिर से स्थापित करना चाहते थे। और इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।

रोलेट एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में एक जनसभा रखी गई थी। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए 10 अप्रैल 1919 को दो बड़े नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को तथा महात्मा गांधी को भी गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन अपने नेताओं की गिरफ्तारी से आम जनता का क्रोध और भी भड़क उठा।

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था और उस दिन हजारों की संख्या में जनसैलाब जलियांवाला बाग एकत्र हुआ था। लोगों मे बूढ़े, बच्चे, जवान और महिलाएं शामिल थी। एक बगीचे तक जाने के लिए एक छोटा सा गलियारा था। वहीं से लोग आ-जा सकते थे।

अंग्रेज ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने इस रास्ते को बंद कर दिया और अपनी पल्टन को निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया। यह दुनिया के कुछ सबसे बड़े नरसंहारों में से एक था। लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था।

इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। लेकिन इस हत्याकांड ने देश को एक नई चेतना दी, नई क्रांति का सूरज उदय हुआ और लोगों ने ठान लिया की अब आज़ादी ही अंतिम लक्ष्य है। शहीद ऊधम सिंह ने लंदन जाकर माइकल ओडवायर को मार डाला। जनरल डायर बीमारी से मर गया। 13 अप्रैल 1961 को जलियांवाला बाग स्मारक का उद्धाटन हुआ।

रोलेट एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को शांतिपूर्ण तरीके से अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक जनसभा रखी गई, जिसे विफल करने के लिए अंग्रेज जबर्दस्त हिंसा पर उतर आए। यह विरोध इतना जबर्दस्त था कि छह अप्रैल को पूरे पंजाब में हड़ताल रही और 10 अप्रैल 1919 को हिन्दू एवं मुसलमानों ने मिलकर बहुत बड़े स्तर पर रामनवमी के त्योहार का आयोजन किया।

हिन्दू-मुसलमानों की इस एकता से पंजाब का तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर घबरा गया। अंग्रेजों ने 13 अप्रैल की जनसभा को विफल करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद के सभी तरीके अख्तियार कर लिए। अंग्रेजों ने खौफ पैदा करने के लिए लोगों के इस जमावड़े से कुछ दिन पहले ही 22 देशभक्तों को मौत के घाट उतार दिया।

इस नरसंहार में मरने वालों की संख्या ब्रितानिया सरकार ने 300 बताई, जबकि कांग्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इसमें एक हजार से अधिक लोग मारे गए। जलियांवाला बाग में गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं, जो अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी कहते नजर आते हैं।

डायर ने हत्याकांड के बाद इस बाग को खत्म करने की कोशिश की, ताकि लोग वहां स्मारक स्थल न बना सकें, लेकिन इसके लिए बने एक ट्रस्ट ने बाग मालिक से घटनास्थल वाली जमीन खरीदकर गोरे हुक्मरानों के इरादों को विफल कर दिया।

पिछले सालों में पंजाब सरकार ने जलियांवाला बाग को पिकनिक स्थल में तब्दील करने की योजना बनाई, लेकिन नौजवान सभा देशभक्त यादगार कमेटी और पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन जैसे संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए विरोध प्रदर्शनों की वजह से सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। इन संगठनों का कहना है कि स्मारक स्थल मूल रूप में ही रहना चाहिए और इसे पिकनिक स्थल बनाया जाना शहीदों का अपमान होगा।

 
 
 
 
 
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