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सिर्फ आलोचना नहीं

भाजपा कह रही है कि विपक्ष हार से बौखलाया हुआ है, इसलिए ईवीएम पर गुस्सा उतार रहा है। मैं इसे इस तरह कहना चाहूंगा कि भाजपा चूंकि जीत गई है, इसलिए ईवीएम को लेकर खुश है। भाजपा के बड़े से बड़े नेता ईवीएम पर सवाल उठा चुके हैं। इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि भाजपा नेता जी वी एल नरसिम्हा राव ने एक किताब तक लिख डाली है- ‘लोकतंत्र खतरे में : क्या हम अपने ईवीएम पर भरोसा कर सकते हैं’। इस पुस्तक की प्रस्तावना में भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी भी ईवीएम की आलोचना कर चुके हैं। कई दूसरे कद्दावर दक्षिणपंथी नेता भी ईवीएम की भत्र्सना कर चुके हैं। इसलिए अगर आज मायावती या केजरीवाल जो कुछ बोल रहे हैं, वह महज उनकी बौखलाहट नहीं है। ईवीएम पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आखिर क्या कारण है कि पश्चिम के कई विकसित देश वापस बैलेट पेपर वाले दौर में लौट गए? कुछ तो खामी जरूर है। सत्तारूढ़ दल को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र में हर सुझाव या आलोचना सिर्फ विरोध नहीं होता। इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों एक साथ बैठकर इस मसले का हल खोजें।
जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

डिजिटल साक्षरता 
एनएसएसओ की कंप्यूटर एबिलिटी पर आधारित रिपोर्ट बताती है कि देश में अब भी काफी कम संख्या में लोग कंप्यूटर तकनीक की दक्षता रखते हैं। इस दक्षता का मतलब स्मार्टफोन, लैपटॉप, कंप्यूटर आदि चलाने की जानकारी से है। जाहिर है, डिजिटल इंडिया का सपना अब भी कोसों दूर है। जब तक देश का आम इंसान कंप्यूटर, मोबाइल आदि का उपयोग करना नहीं सीख लेता, तब तक डिजिटल इंडिया या डिजिटल अर्थव्यस्था का उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला। सरकार डिजिटल साक्षरता पर संजीदगी दिखाए।
विजय कांडपाल, देहरादून

पुराने दौर की वकालत
हमारे देश में आजकल यह क्या हो रहा है? एक तरफ जिस ईवीएम की निष्पक्षता से जीत की जश्न मनाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ पार्टियां अपनी हार स्वीकार करने की बजाय उस मशीन पर ही दोष लगा रही हैं। शायद हार को स्वीकार करना उन्हें शान के खिलाफ लग रहा होगा। इसने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को चकनाचूर कर दिया है। इसलिए वे पार्टियां अब ईवीएम पर ही सवाल उठा रही हैं। नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव आयोग एक विश्वसनीय और निष्पक्ष संस्था है। यह अपने आप में मजाक ही है कि जिस व्यवस्था को बदले बरसों बीत गए हैं, उन्हें हम फिर से वापस लाने की मांग कर रहे हैं। मतपत्र से वोट डालने का भला अब क्या औचित्य?
राकेश कुमार सिंह, नई दिल्ली

नवचेतना का संचार 
प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन उचित जान पड़ता है कि भाजपा ने यह जीत विकास के एजेंडे पर हासिल की है, जिसे मीडिया भी अंदाजा लगाने में विफल रहा। नरेंद्र मोदी तब अपना कद और बड़ा कर ले जाते हैं, जब वह पार्टी कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि मैं प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक की तरह काम करता हूंं। दरअसल, भाजपा की अप्रत्याशित जीत से तमाम चुनाव विश्लेषक चकित हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मोदी ने चुनाव प्रचार में नए वोटरों को नए भारत की तस्वीर दिखाई, जबकि दूसरे सभी दल घिसे-पिटे एजेंडे पर अपनी बात रखते रहे। समाज अब आगे बढ़ चुका है। ऐसा युवा वर्ग, जो गत 14-15 वर्षों से गैर भाजपाई सरकारें देखता आ रहा था, उसने स्वाभाविक तौर पर इस बार भाजपा को चुना है। जनता आज मोदी को एक दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में देख रही है। जहां मोदी का कथन ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जनता के दिल की गहराइयों में बैठ गया, वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का बयान कि ‘न सोऊंगा, न सोने दूंगा’, लोगों में नवचेतना का संचार कर रहा है। 
मनोज कुमार शर्मा
बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

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