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बचपन बेचते बच्चे

First Published:20-03-2017 09:34:05 PMLast Updated:20-03-2017 09:34:05 PM

बचपन बेचते बच्चे
आज दुनिया में सर्वाधिक बाल मजदूर भारत में हैं। जिन हाथों में कलम होना चाहिए, वे हाथ कचरा बीन रहे हैं। आजादी के 70 साल के बाद भी बाल मजदूरी का कलंक हम मिटा नहीं पाए हैं। शिक्षा का अधिकार कानून तो हमने लागू कर दिया, पर आज भी लाखों बच्चे स्कूलों से दूर हैं। इसका यही मतलब है कि राज्य सरकारों ने इस कानून को लागू करने में जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है। इसी तरह, भारत में खतरनाक तथा जोखिम भरे कामों में बच्चों को काम कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है, मगर तब भी बच्चे खतरनाक परिस्थितियों में काम करते देखे जा सकते हैं। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। अगर इन बच्चों का वर्तमान ही अंधकार में है, तो वे आगे जाकर देश का भविष्य कैसे बन सकेंगे? ऐसे में, यह बेहद जरूरी है कि गरीबी, निरक्षरता व बाल मजदूरी को एक साथ निशाना बनाया जाए। बच्चों को लोकर केंद्र व राज्य सरकारों को कहीं ज्यादा गंभीरता दिखानी चाहिए।
कैलाश बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली

पूर्वाग्रह न पालें
इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों ने देश के लोकतंत्र को एक मजबूत दिशा दी है। जाति और धर्म की बेडि़यों को तार-तार करके मतदाताओं ने राष्ट्र-निर्माण के पक्ष में अपना मत दिया है। मगर पूर्वाग्रही तत्वों को यह बदलाव हजम नहीं हो रहा है। विचारणीय है कि कोई भी निरपेक्ष व्यक्ति किसी जाति या धर्म का शत्रु भला कैसे हो सकता है? प्रधानमंत्री का पद हो या मुुख्यमंत्री का, दोनों पर बैठा शख्स न तो पूर्वाग्रह पाल सकता है और न किसी के प्रति भेदभाव कर सकता है। भेदभाव के उदाहरण तो उन तत्वों के आचरण में मिल सकते हैं, जो किसी परिवार, जाति या मजहब की सियासत करते हैं। राष्ट्र की बात करने वाले लोग तो राष्ट्र-हितैषी आचरण और कानून के पालन में विश्वास करते हैं।
सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ

कैसा अच्छा दिन
महंगाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हर दिन कुछ न कुछ महंगा हो जाता है, फिर चाहे वह पेट्रोल-डीजल की कीमत हो या कोई दूसरी वस्तु। यदि बीते कुछ दिनों पर गौर करें, तो कभी पंजाब में डीजल और पेट्रोल की कीमतों में भारी अंतर होता था, पर आज यह मामूली रह गया है। इसी तरह, घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें वक्त-बेवक्त बढ़ा दी जाती हैं। रेलवे टिकटों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। क्या इसी अच्छे दिन का सपना देखा गया था?
दीपक शर्मा,चंडीगढ़

संत को सत्ता
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने विधायक दल का नेता अंतत: योगी आदित्यनाथ को ही चुना और दो उप-मुख्यमंत्रियों के साथ उन्हें राज्य की सत्ता भी सौंप दी। अब जबकि राज्य में ‘योगी-राज’ की शुरुआत हो चुकी है, तो सवाल यही है कि कट्टर हिंदू की छवि रखने वाले योगी अपनी छवि को कितना बदल पाते हैं? हालांकि शपथ ग्रहण समारोह के बाद उनके स्वर पहले से बदले-बदले जरूर लग रहे थे, मगर यह शंका बनी हुई है कि उनका यह नया चोला आखिर कितने दिनों तक बना रहेगा?
प्रदीप कुमार तिवारी, ग्रेटर नोएडा

टिकट की परेशानी
दिल्ली की बसों में टिकट लेते वक्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बसों में एक साथ कई सारे यात्री प्रवेश करते हैं, जबकि दाखिले गेट के बाएं तरफ कंडक्टर टिकट लेकर बैठा होता है। इस कारण काफी यात्री गेट पर ही खड़े होकर टिकट लेते रहते हैं। इससे अगले ठहराव पर चढ़ने वाले यात्रियों को काफी परेशानी होती है। इस मुश्किल का यही समाधान हो सकता है कि कंडक्टर की सीट बाईं की बजाय दाईं कर दी जाए। इससे बस में चढ़ने के बाद यात्रियों को काफी जगह मिल जाएगी और वे आराम से टिकट ले सकेंगे। इससे दूसरे यात्रियों को भी सहूलियतें होंगी।
जितिन कुमार गोठवाल

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