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अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध भी आज नकल पर आधारित

वाराणसी वरिष्ठ संवाददाता First Published:23-09-2016 06:56:00 PMLast Updated:23-09-2016 07:00:13 PM

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज जो शोध हो रहे हैं, वे सब नकल पर आधारित हैं। इनमें मौलिकता नहीं है। चिंता की बात यह है कि जिस गोल्डेन धान को 10 साल पहले विकसित करके पेटेंट भी करा लिया गया, वह अबतक दक्षिण-पूर्वी एशिया के किसानों तक नहीं पहुंच सका है। बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान में शुक्रवार को आयोजित व्याख्यान में इस स्थिति पर चिंता जतायी गयी।

हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस ऐंड मैनेजमेंट की संयुक्त निदेशक डॉ. कल्पना शास्त्री ने कहा कि यह देखने की जरूरत है कि जो शोध हो रहे हैं, क्या वे आम आदमी को लाभ पहुंचा रहे हैं, या शोधपत्रों में सिमट कर रह गये हैं। वैज्ञानिकों ने मक्के का एक जीन जपोनिका धान में डालकर गोल्डेन धान विकसित किया। इसके बारे में कहा गया कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया के लोगों में विटामिन ए की कमी को दूर करेगा। अंतरराष्ट्रीय जर्नल में वैज्ञानिकों का नाम छप गया पर धान का अबतक कहीं पता नहीं है। इस धान पर भारत में भी काम शुरू किया गया था पर अबतक यह प्रजाति हम विकसित नहीं कर पाये। इस स्थिती को समझने और सुधारने की जरूरत है। संकाय प्रमुख प्रो. ए. वैशम्पायन ने वक्ता का परिचय कराया। व्याख्यान में प्रो. रमादेवी, रमेश कुमार सिंह, प्रो. जेपी शाही, प्रो. एपी सिंह, प्रो. पीएस सिंह, प्रो. नीमा मौजूद रहे। प्रो. जेपी लाल ने आभार जताया। संचालन प्रो. राजेश सिंह ने किया।

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Web Title: International research today also Based on coping
 
 
 
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