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नदी और तालाब में स्नान कर माताओं ने सुनीं व्रत की कथा

सीवान। हिन्दुस्तान संवाददाता First Published:23-09-2016 08:19:00 PMLast Updated:23-09-2016 11:20:57 PM
नदी और तालाब में स्नान कर माताओं ने सुनीं व्रत की कथा

अश्विन मास की कृष्णपक्ष अष्टमी को माताओं ने अपने पुत्र की सलामती के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत का निर्जला उपवास रखा। शाम में नदी व तालाब में स्नान कर संतान की आयु, आरोग्य व कल्याण के लिए पूजा-अर्चना की। इस व्रत के संदर्भ में ऐसी मान्यता है कि जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत पुत्र की प्राप्ति व उसकी लंबी उम्र की कामना के लिए भी किया जाता है।

बहरहाल शुक्रवार की अहले सुबह व्रती महिलाओं ने सरगही कर जिउतिया व्रत का निर्जला उपवास रखा। पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम में नदी या तालाब में स्नान करने के साथ ही कई महिलाओं ने घर पर भी स्नान कर दान-पुण्य किया। शहर के दाहा नदी पुलवा घाट व शिवव्रत साह के घाट के साथ ही पचमंदिरा पोखरा पर भी काफी संख्या में महिलाओं ने स्नान-ध्यान कर दान-पुण्य किया। मौके पर पूर्वजों को जल तर्पण किया।

इस मौके पर शहर के शुक्ल टोली हनुमान मंदिर, नया बाजार के भावनाथ मंदिर, महादेवा के पंचमुखी शिव मंदिर व कसेरा टोली के शिव मंदिर समेत अन्य मंदिरों में व्रती माताओं ने जिउतिया व्रत की कथा सुनी। अरियार व बरियार के पौधे का इस दौरान गले लगाया।

पंडित उपेन्द्र पांडेय व जयनारायण शास्त्री ने बताया कि जिउतिया व्रत पुत्र प्राप्ति व उसके मंगलमय जीवन के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि लोक कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में एक चील व सियारिन थी। दोनों एक-दूसरे की मित्र थी। एक समय कुछ महिलाओं को जिउतिया का व्रत रखते देख उन दोनों ने भी इस व्रत को किया। हालांकि व्रत रखने के बाद भूख के कारण सियारिन परेशान हो उठी। भूख से परेशान सियारिन चुपके से खाना खा ली लेकिन चील ने जिउतिया व्रत को पूरी निष्ठा भाव के साथ किया। उन्होंने बताया कि इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ दिन बाद सियारिन के सभी बच्चों की मृत्यु हो गई जबकि चील के सभी बच्चे दीर्घायु हुए। ब्राह्मण द्वय ने बताया कि तभी से पितृ पक्ष के मध्य में पुत्र की कामना व कुशलता के लिए माताएं जिउतिया का व्रत करती हैं।

इधर शनिवार को माताएं जिउतिया व्रत का समापन करेंगी। इससे पहले चावल, दाल, तराई आदि का दान-पुण्य कर जिउतिया का धागा गले में पहनेंगी। उसके बाद मुंह जूठा करेंगी।

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Web Title: Mothers keep Jiutiya for wellness of their sons
 
 
 
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