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पटना साहिब में विकसित हुई लंगर की परंपरा

पटना। अभिषेक कुमार First Published:23-09-2016 05:52:00 PMLast Updated:23-09-2016 09:56:18 PM
पटना साहिब में विकसित हुई लंगर की परंपरा

पटना साहिब में ही सिख पंथ के संस्थापक गुरुनानक देव जी ने संगत और पंगत की परंपरा को विकसित करनेवाली लंगर की नींव रखी थी। इसी परपंरा को आगे भी गुरुओं ने जाति-धर्म व ऊंच-नीच से ऊपर होकर चलाया।

जत्थेदार ज्ञानी इकबाल सिंह बताते हैं कि सिख पंथ के प्रथम गुरु नानकदेव जी महाराज 1506 ई. में पूर्व की यात्रा करते हुए गायघाट स्थित संगत पर आए थे। उसी समय उन्होंने लंगर की नींव रखी थी। यह परंपरा आज तक बरकरार है।

हालांकि इस परंपरा को विकसित करने के लिए सिख समुदाय के तीसरे गुरु अमर दास ने इसे अनिवार्य बना दिया। उनका कहना था कि उनके दर्शन को आनेवाले संगत पहले प्रसाद खा कर उनके पास आएं। इसी परंपरा के तहत बादशाह अकबर भी जब गुरु अमरदास से मिलने पंजाब के कपूरथला स्थित गोविंद बाल साहिब गुरुद्वारा पहुचे, तब उनको भी लंगर छक कर ही गुरु से मिलने दिया गया।

इसी लंगर की समृद्ध परंपरा को विकसित करते हुए गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा था कि यह परंपरा जाति भेद और छुआछूत से परे होकर संगत-पंगत की अनुभूति है। अर्थात् ‘साच कहू सुन लेहु सबै, जिन प्रेम कियो तिनही प्रभु पायो, मानस की जात सबै एक पहचानबो, इसी मूल मंत्र के साथ लंगर की समृद्ध परंपरा गुरुद्वारों में चली आ रही है।

तख्त साहिब में सालोंभर सुबह-शाम लंगर चलता है। गुरुपर्व के दौरान यह लंगर अटूट हो जाता है यानी निरंतर चलता है। लंगर बनाने का काम सिख श्रद्धालु करते हैं। शताब्दी समारोह के दौरान तख्त साहिब, बाल लीला गुरुद्वारा, कंगनघाट समेत कई स्थानों पर अटूट लंगर की व्यवस्था की जा रही है।

बड़ा गुरुद्वारा, गायघाट

बड़ा गुरुद्वारा गायघाट के पास स्थित है। सबसे पहले इस भूमि को गुरु नानक देव जी ने अपनी पूरब यात्रा के समय पवित्र किया था। भक्त जैतामलजी गुरुजी के शिष्य बने और इस जगह को संगत का नाम दिया गया। यह बाद में बड़ी संगत गायघाट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद नौवें गुरु तेग बहादुर पूरब की यात्रा के समय परिवार समेत यहां ठहरे थे और भक्त जैतामल को मुक्त किया था। इसके बाद परिवार समेत सालिस राय जौहरी की संगत (वर्तमान में तख्त साहिब) में आए। यह घटना सन् 1666 ई. की है। इस गुरुद्वारा में हर साल गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश पर्व मनाया जाता है।

गुरुजी की यादगारी वस्तुएं

1. थड़ साहेब (जिस पर गुरुजी आकर बैठे थे)

2. हरसिंगार का वृक्ष (जिसके साथ गुरुजी ने घोड़ा बांधा था)

3. गुरु परिवार की चक्की

4. खिड़की साहिब

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Web Title: Langar tradition developed in Patna Sahib
 
 
 
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