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आज भी याद आते है विजय के वह पल
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:09-02-10 04:11 PM
Last Updated:09-02-10 04:21 PM
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विश्व कप में भारत की एकमात्र खिताबी जीत के सूत्रधार रहे अशोक कुमार और असलम शेर खान आज भी उन पलों को नहीं भूले हैं जब उनके गोल ने भारतीय हाकी के इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़कर कामयाबी की नई इबारत लिखी थी।

असलम ने 1975 विश्व कप के सेमीफाइनल में मलेशिया के खिलाफ जबकि अशोक ने फाइनल में चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ विजयी गोल दागकर भारत को विश्व चैम्पियन बनाया था। भारतीय टीम इसके बाद कभी पोडियम पर जगह नहीं बना पाई जिसका इन दोनों दिग्गजों को दुख भी है।

मलेशिया के खिलाफ अपने कैरियर के सबसे भावुक मैच को याद करते हुए असलम ने कहा कि पंद्रह दिन के टूर्नामेंट की 13 रातों तक मैं ठीक से सो नहीं पाया। रात को मेरे आंसुओं से तकिया भीग जाता था। मैदान पर उतरने का मौका नहीं मिलने से मुझे काफी तकलीफ हो रही थी। खुद को साबित करने के लिए मुझे केवल एक मौके का इंतजार था।

सेमीफाइनल में मलेशिया के खिलाफ आखिर वह मौका आ ही गया जब असलम को उस समय मैदान पर उतरने का मौका मिला जब मैच 2-2 से बराबर चल रहा था और अंतिम पांच मिनट का खेल बाकी था। असलम ने कहा कि जब अंतिम लम्हों का खेल चल रहा था तब मैनेजर बलबीर सिंह रोते हुए मेरे पास आएऔर बोले असलम बेटा तू जा अब तेरा खुदा ही हमें बचा सकता है। मुझे इसी मौके का इंतजार था और मैंने पेनाल्टी कार्नर पर गोल करके खुद को साबित कर दिया।

असलम के साथ अशोक ने भी स्वीकार किया कि सेमीफाइनल आखिर लम्हों में दागा यह गोल फाइनल में उनके गोल के जितना अहम था। अशोक ने कहा कि मलेशिया के खिलाफ मैच टूर्नामेंट का हमारा सबसे मुश्किल मुकाबला था। मलेशिया कहीं से भी हमारी टक्कर की टीम नहीं थी लेकिन घरेलू परिस्थितियों और घरेलू दर्शकों की मौजूदगी में उनका मनोबल काफी बढ़ गया था और उन्हें हराना काफी मुश्किल हो गया था। उन्होंने कहा कि मुझे आज भी याद है कि मैच खत्म होने में जब कुछ ही समय बचा था तब मैनेजर और कोच ने असलम शेर खान को मैदान पर उतारने का फैसला किया और उसने गोल करके टीम को जीत दिला दी। फाइनल में मेरा गोल जितना अहम था उतना की महत्वपूर्ण असलम का गोल भी था।

भारत 1971 और 1973 विश्व कप में क्रमश: तीसरे और दूसरे स्थान के साथ चैम्पियन बनने से चूक गया था और अशोक की माने तो टीम ने तीसरे विश्व कप के लिए कुआलालम्पुर के होटल में कदम रखते की विश्व कप की ट्राफी देखकर इसे थामने का सपना संजो लिया था। अशोक ने कहा कि हम 1973 विश्व कप के फाइनल में टाईब्रेकर में हारने के बारे में सोचकर हमेशा उदास हो जाते थे। हमारे पास काफी अच्छा मौका था और हम चूक गए जिसकी कसक हमारे दिलों में थी।

चार विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले इसे दिग्गज हाकी खिलाड़ी ने कहा कि 1975 विश्व कप के लिए कुआलालंपुर के होटल में कदम रखने पर ट्राफी को देखते ही हमने इसे जीतने का इरादा कर लिया था। हमने ठान लिया था कि इस बार हमें ही चैम्पियन बनना है।

फाइनल में पाकिस्तान ने शुरुआत में ही गोल दागकर बढ़त बना ली थी लेकिन भारत ने सुरजीत सिंह के गोल से बराबरी पाने के बाद अशोक के गोल की मदद से जीत हासिल कर ली लेकिन इस दिग्गज खिलाड़ी ने कहा कि शुरुआत में गोल गंवाने के बाद टीम दबाव में आ गई थी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने शुरुआत में ही बढ़त बना ली। उस समय कुछ जूनियर खिलाड़ियों को लगा कि अब हम नहीं जीत सकते जिस पर मैं काफी गुस्सा हुआ और उनसे कहा कि अभी हमारे पास काफी समय है और हम जीतकर रहेंगे।

इस अर्जुन पुरस्कार विजेता ने कहा कि कुछ देर बात सुरजीत ने पेनाल्टी कार्नर पर गोल दागकर बराबरी दिला थी जिससे टीम जोश में भर गई और उसे विश्वास हो गया कि अब उसे कोई नहीं हरा सकता है। इसके बाद दूसरे हाफ में मेरे गोल पर टीम झूम उठी। अंतिम दस मिनट में हालांकि हम काफी नर्वस थे लेकिन जीत दर्ज करने में सफल रहे।

अपने विजयी गोल के बारे में अशोक ने कहा कि जब गेंद मेरे पास आई तो अर्जुन के निशाने की तरह मुझे भी सिर्फ विरोधी टीम का गोल पोस्ट नजर आ रहा था। मेरे दिगाम में उस समय सिर्फ इतनी योजना थी कि मुझे गेंद को गोल में डालना है जिसमें मैं सफल रहा।

असलम ने भी कहा कि मलेशिया को हराने के बाद टीम को विश्व कप जीतने का भरोसा हो गया था, मलेशिया को हराने के बाद हमारा मनोबल बढ़ा। पाकिस्तान मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया था क्योंकि हम हार के करीब पहुंचकर जीतने में सफल रहे थे और हमें इसका फायदा उठाते फाइनल में पूरे मैच के दौरान दबदबा बनाए रखा था।

 

 
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