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सावधान! खाड़ी देशों में कहीं जहीर जैसा न हो आपका हाल

अम्बेडकरनगर सर्वजीत त्रिपाठी/अनिल तिवारी First Published:23-09-2016 06:54:00 PMLast Updated:23-09-2016 06:56:18 PM

दुश्वारीखाड़ी देशों में नौकरी की तमन्ना वालों को आईना दिखा रहे जहीरकुवैत गए सही सलामत, वापस आए हैं तो हो चुके हैं दिव्यांग चित्र परिचय-23एएमबीपी1-कुवैत से लौटे जहीर अकबरपुर बस स्टेशन पर पड़े लाचार

अम्बेडकरनगर सर्वजीत त्रिपाठी/अनिल तिवारी

आए दिन मीडिया में खबरें आती हैं कि फलां खाड़ी देश में इतने हिन्दुस्तानी फंसे हैं। भारतीयों ने भारत सरकार से प्राण रक्षा की गुहार लगाई है। विदेश मंत्री से अप्रवासी भारतीयों ने लगाई गुहार जैसी शीर्षक की खबरें शायद ही सबको विचलित करती हों मगर अकबरपुर बस स्टेशन क्षेत्र में जिसने भी जहीर मोहम्मद को देखा उसकी आंखें नम हो गईं। टांडा के जैनुद्दीनपुर निवासी जहीर मोहम्मद की हालत पागलों जैसी है। वे चलने फिरने में लाचार हैं। कपड़े मैले और कुचले हैं। लाचारी ऐसी कि नहा पाना तो दूर स्वयं पानी से हाथ मुंह भी नहीं धो पा रहे हैं। उनकी इस हालत को देखकर सभी की आंखें भर आईं और खाड़ी देशों में भारतीय से होने वाले अमानवीय व्यवहार को देख कर सभी उन मुल्कों को कोस रहे थे। दरअसल जैनुद्दीनपुर के मो. दाउद के पुत्र जहीर मोहम्मद 29 जनवरी 2016 को कुवैत गए थे। एक लाख रुपया लोन लेकर कुवैत गए जहीर को वहां बकरी चराने का काम मिला। बीते दिनों अराजक तत्वों ने तार बिछाकर चोटहिल कर दिया। चोट ऐसी लगी है कि कमर के नीचे का पूरा हिस्सा नाकाम हो गया है। खास बात है कि मालिक इलाज कराने के बजाय जहीर के काम न करने लायक जानकर वापस भेज दिया। जेट एयरवेज की फ्लाइट पर टिकट देकर बैठा दिया। बीते 20 सितम्बर को मुम्बई पहुंचे और जैसे तैसे टे्रन से लखनऊ और वहां से अकबरपुर आए। अकबरपुर रेलवे स्टेशन से घिसटते बस स्टेशन पहुंचे जहीर मोहम्मद ने 'हिन्दुस्तान' को अपनी व्यथा बताई। फिलहाल चौरसिया आटो के सोनू ने जहीर के घर वालों को सूचना दी। अकबरपुर आकर पिता अपने साथ जहीर को घर ले गए मगर अपने पीछे खाड़ी देशों का सच छोड़ गए। इनसेट...पिया मत जा विदेशजैनुद्दीनपुर निवासी जहीर मोहम्मद की पागलों जैसी हालत, चलने फिरने में लाचारी, मैले और कुचैले कपड़े के साथ स्वयं पानी से हाथ मुंह भी न धो पाने की लाचारी देख कर सभी की आंखें हैरत से भर जा रही थी। खाड़ी देशों में भारतीयों की दुर्दशा पर सभी को अपने घर की नमक रोटी में ही संतोष करना श्रेयकर लगने लगा। भौतिक सुखों की प्राप्ति या वृद्धि के लिए गैर देश में जाकर नारकीय जिन्दगी जीने से अच्छा अपनी जन्मभूमि पर ही काम करना सभी को मुफीद लगा। काश सब ऐसा ही सोचते और सरकार भी अमानवीय व्यवहार के पीड़ित अपने देश के नागरिकों के प्रति संवेदनशील हो जाती।

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