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लविवि हिन्दी विभाग

वरिष्ठ संवाददाता First Published:23-09-2016 08:06:00 PMLast Updated:23-09-2016 07:48:13 PM

75 की उम्र में भी छात्र हैं मैनेजर पांडेय

-प्रख्यात आलोचक व जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर मैनेजर पांडेय का लविवि में अभिनंदन

-समाज, साहित्य और आलोचना विषय पर हुई संगोष्ठी

लखनऊ। धीर-गंभीर आलोचक मगर बच्चों से चंचल...किताबें जिनके लिए संजीवनी हैं और शिष्यों का स्नेह उनके जीवन का आधार...यही है प्रख्यात आलोचक व जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मैनेजर पांडेय की पहचान।

शुक्रवार को उन्होंने जीवन के 75 वसंत पूरे किए और इस अवसर पर लविवि के हिन्दी विभाग की ओर से मालवीय सभागार में विशेष अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। यहां 'साहित्य समाज और आलोचना' विषय पर संगोष्ठी भी हुई जिसमें मशहूर साहित्यकारों ने हिस्सा लिया और आलोचना के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने की। रविकांत के संचालन में शुरू हुए सत्र में प्रो. मैनेजर की शोध छात्रा रहीं डॉ. मालविका हरिओम, उनकी पत्नी प्रो. चंद्रा सदायत व उनकी पुत्री रेखा पांडेय ने विचार व्यक्त किए। आगे के सत्रों में वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव, बजरंग बिहारी तिवारी, अधीर कुमार, डॉ. हरिओम, रविभूषण, कमलेश वर्मा, अरविंद अवस्थी, दिनेश कुमार और राजेश मल्ल ने विचार व्यक्त किए। हिन्दी विभाग से विभागाध्यक्ष प्रो. प्रेमसुमन शर्मा, प्रो. पवन अग्रवाल, डॉ. श्रुति, डॉ. ममता तिवारी समेत सभी शिक्षक व छात्र मौजूद रहे।

दो पुस्तकों का विमोचन: उद्घाटन सत्र में दो पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। इनमें 'आलोचना व समाज' का संपादन रविकांत व आकांक्षा ने किया है और 'दूसरी परम्परा का शुक्ल पक्ष' के लेखक कमलेश वर्मा व शुचिता वर्मा हैं।

बॉक्स

दारा शिकोह पर शोध कर रहे हैं मैनेजर

भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, आलोचना में सहमति-असहमति, हिन्दी कविता का अतीत और वर्तमान जैसे तमाम विषयों पर लिख चुके प्रो. पांडेय की नवीनतम कृति 'मुगल बादशाहों की हिन्दी कविता' है और अब वह दारा शिकोह पर शोध कर रहे हैं।

पत्नी व बेटी की नजर में मैनेजर- (पत्नी व बेटी के साथ फोटो भी है)

'वह जितने ईमानदार गुरु हैं उतने ही समर्पित छात्र भी। आज भी वह 6 घंटे अध्ययन करते हैं। एक राज की बात यह कि छात्र उनसे डरते हैं और वह मुझसे।'

प्रो. चंद्रा सदायत (पत्नी)

'मैं कभी उनकी विद्यार्थी नहीं रही लेकिन जब वह अपने छात्रों से बात करते तो किचन में खड़े होकर मैं उन्हें सुनती और उनकी बातें नोट कर लेती थी। किताबों के लिए उनके जैसी बेचैनी मैंने किसी और में नहीं देखी।'

रेखा पांडेय (पुत्री)

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