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ब्लॉग वार्ता : जौनपुर का एसी सैलून

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में एसी सैलून है। एक नहीं दो। दाढ़ी बनवान के लिए पब्लिक पैंतालीस मिनट लाइन में लगती है। पता नहीं दाढ़ी बनवान के लिए या फिर एयर कंडीशन की बसंती हवा खान के लिए। हर्षवर्धन त्रिपाठी अपने ब्लॉग ‘बतंगड़’ में इसकी जानकारी दे रहे हैं। पढ़ते ही हिंदुस्तान के तमाम जनपदों की बदलती तस्वीर आंखों के सामने नाचने लगती है। अव्वल तो बदलाव के नाम पर जोड़ घटाव ही हुआ है मगर जौनपुर में एयरकंडीशन सैलून। मार्केट पसरन के लिए कहीं भी पांव पसार देता है। क्िलक कीजिए ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्ड्ढड्डह्लड्डठ्ठद्दड्डस्र्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व।द्धह्लह्लश्चज्ड्ढड्डह्लड्डठ्ठद्दड्डस्र्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व। आपको यहां पवन गोल्ड बस सेवा का किस्सा मिलेगा। नन स्टॉप है। हिंदी प्रदेश के लोगों में नन स्टॉप सेवा का गजब का जुनून है। कई पीढ़ियों तक बैलगाड़ी फिर बैलगाड़ी सरीखी रेलगाड़ी का दुख अभी उतरा नहीं है। बसां का नाम हमने क्रेक सेवा रखा। बसों को पगली तक कहा। वैसी बसें तो नन स्टॉप हो, उनके नाम ऐसे ही रखे गए। तूफान मेल, ड्राइवर की सीट पर पायलट लिखा होता था। यह सभी बिहार, यूपी में पैदा हुए लोगों की अंदरूनी ख्वाहिश है जो ऐसे नामों और सेवाओं से बाहर आती रहती है। हर्षवर्धन अपने गांव का किस्सा सुना रहे हैं। एक रिश्तेदार की कहानी। रेलवे में ड्राइवर चाचा ने अपने एक बच्च का नाम गार्ड रखा है और दूसरे का टीटी। मुंबई, दिल्ली के क्लास वाले लोग ऐसे नामों के पीछे छुपे सपन का दर्द क्या जाने। वो तो रंजीत को भी रैंजी बना देते हैं। गांव वाल कहां कम होते। हर्ष बता रहे हैं कि टीटी वाले भैया की भाभी को लोग टिटियाइन भौजी कह कर बुला रहे हैं। सपना सिर्फ तेंदुलकर बनन का नहीं होता। टीटी बनन का भी होता है। मुंबई में रहने वाले हर्ष के ब्लॉग पर महानगर, इलाहाबाद जैसा शहर और गांव के बीच बातों का बतंगड़ बन रहा है। मुंबई की लोकल का जिक्र आ रहा है तो अपने मित्र के मित्र की हत्या की बेबस खबर। बहराइच में रंगकर्मी राकेश की हत्या सिर्फ बहराइच की नहीं है। तमाम जनपदों में घेर कर मार दिए गए ऐसे तमाम नौजवानों के हत्यारे आज तक नहीं पकड़े जा सके हैं। कई बार सोचता हूं ये बचे हुए हत्यारे कैसे सोते होंगे रातों को या फिर ह्त्या को लेकर कितना सहज हो चुके होंगे। और बचे रहकर हमारे बीच जाने किस नाम से रहते होंगे। हर्षवर्धन बिजनेस चैनल में काम करते हैं। टीवी न्यूज चैनलों में संध्याकालीन बवाल से घबराए हुए हैं। पब्लिक मनोरंजनमुखी है। टीवी बवालमुखी। हर्षवर्धन घबराते हैं कि बिजनेस चैनल में रह कर बच गया वर्ना भूत प्रेत और बाबाओं के धमकाने वाले ज्योतिष भविष्यवाणियों की स्क्रिप्ट लिखनी पड़ती। हिंदी के अखबारों में खबर छपती है और हिंदी के न्यूज चैनलों में भूत प्रेत। दर्शक और पाठक में कितना फर्क है। हिंदी प्रदेश में अगर टीवी सेट बिकते हैं तो उनमें से नौ सौ टीवी सेट दहेज के कारण बिकते हैं। ड्राइंग रूम में मौजूद टीवी सेट एक सामाजिक भ्रष्टाचार की देन है। अब उस पर पब्लिक भूत प्रेत ही देखेगी। दहेज पर दिया जाने वाला भाषण नहीं देखेगी। कैसे देखेंगे ससुर, पुत्र और बहू एक साथ बैठकर। एंकर जैसे ही बोलेगा कि दहेज के लोभी ससुर ने बहू को मार दिया, ससुर लाफ्टर चैनल लगा देगा। तभी तो दलील दी जाती है कि समाज के साथ टीवी बदल रहा है। बदल नहीं रहा है। समाज की बुराइयों के साथ टीवी एडजस्ट कर रहा है। मंदी में शायद पत्रकारों को पत्रकारिता याद आएगी। अपने लिए भी और समाज के लिए भी। शायद इसीलिए ब्लॉग पर हर्षवर्धन के लेख राजनीतिक हो उठते हैं। ट्रांसफर के सीजन में यूपी के किसी अफसर की एक कविता है । बीत गया है मार्च मई ने दस्तक दी है,ड्ढr वित्त वर्ष की लेखा बन्दी सबन की है।ड्ढr जून आ गया भाई, सब यूं बोल रहे हैं,ड्ढr तबादला सीजन है, अफसर डोल रहे है।ड्ढr मंत्री जी के दर पर जाकर शीश झुकाओ,ड्ढr स्वाभिमान, ईमान, दक्षता मत दिखलाओ।ड्ढr जैसी भारी थैली, वैसी सीट मिलेगी,ड्ढr मंत्री जी तक परिचय है तो छूट मिलेगी। इस कविता को पढ़िए और मार्च महीन का इंतजार कीजिए। और हर्ष का लेख जरूर पढ़िये। ये जौनपुर है। यहां कई सालों से नया बाजार नहीं बना है। कमाई का नया साधन नहीं है। जाति का अहं सबसे ऊपर है। ऐसे में एसी सैलून में दाढ़ी बनवा कर ही लोग बदलाव महसूस कर रहे हैं। इस पर अभिषेक की टिप्पणी है। यह सिर्फ जौनपुर नहीं, पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश की तस्वीर है। लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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