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निर्वासित जीवन बिता रहे भारतीय दंपति का स्वदेश आने का रास्ता साफ

हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा है कि किसी को नागरिकता के अधिकार नहीं दिया जाना उसके अधिकारों का सबसे खराब तरह का हनन है। हाईकोर्ट ने पिछले 23 सालों से निर्वासित जीवन बिता रहे भारतीय दंपति को स्वदेश आने का रास्ता साफ करते हुए यह टिप्पणी की है। सरकार द्वारा पासपोर्ट देने से इनकार के बाद यह दंपति दूसरे देश में जीवन बिता रहे है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ ने केंद्र सरकार को दंपति को वैध पासपोर्ट जारी करने का आदेश दिया है। यह दंपति मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। पीठ ने कहा कि यह अत्यंत परेशान करने वाली बात है कि दो भारतीय नागरिकों को कनाडाई नागरिकता के लिए आवेदन करने और इसे प्राप्त करने से पहले संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग (यूएनएचसीआर) से शरण मांगने के लिए विवश होना पड़ा। पीठ ने कहा है कि ‘ क्या इस वंचित किये जाने की किसी भी तरह से क्षतिपूर्ति की जा सकती है, तो इस एक ही जवाब होगा नहीं। हाईकोर्ट का यह फैसला मणिपुर के दंपति की ओर से दाखिल याचिका पर आया है। याचिका में उन्होंने अपनी नागरिकता रद्द किये जाने और 1995 में जब वे विदेश में थे तब उनका पासपोर्ट जब्त करने के खिलाफ दाखिल की थी। महिला पेइंगमला लुइथुई 1994 में जब थाईलैंड में थीं उनका पासपोर्ट गुम हो गया था लेकिन भारतीय अधिकारियों ने उन्हें कभी भी एक डुप्लीकेट पासपोर्ट जारी नहीं किया। उनके पति लुईंगम लुइथुई को थाईलैंड में उनके साथ रहना पड़ा क्योंकि वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते थे।

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  • Web Title:high court
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