class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कहानी : आजादी का दीवाना

1925 की एक शाम। झांसी में मास्टर रुद्रनारायण के घर के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। परिवार के लोग सहम गए। परिवार वालों से छिपा न था कि मास्टर जी स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। कई बार उनके घर पर देश की गुलामी मिटाने के लिए सिर पर कफन बांध चुके देशभक्तों की बैठक हो चुकी थी। उन्हें बार-बार अंदेशा होता था कि पुलिस वाले घर पर आ धमकेंगे। और शायद वह दिन आ ही गया था।
मास्टर रुद्रनारायण ने धीरे से दरवाजा खोला। सामने पुलिस दल के बदले, एक नवयुवक खड़ा था। उम्र मुश्किल से बीस पार, चेहरे पर ढृढ़ता और अनोखा तेज।
“कौन हैं आप?” मास्टर रुद्रनारायण ने पूछा।
“अपना साथी या भाई ही समझ लीजिए। एक ही मिट्टी से उपजे भारत मां के लाल हैं हम दोनों।” युवक शांत स्वर में बोला। उसकी आवाज में ऐसी गंभीरता थी कि कब मास्टर रुद्रनारायण ने किवाड़ खोल दिए, उन्हें खुद पता न चला।
“आइए।” एक तरफ हटते हुए मास्टर रुद्रनारायण बोले।
युवक घर में दाखिल हुआ। मास्टरजी ने उसे आसन दिया। फिर पूछा, “भाई, क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?”
“जी, यहां मैं बेनाम हूं। वैसे आजादी के दीवानों में मुझे शामिल समझिए। आपके पास आया हूं। आप ही मेरा नामकरण कर दीजिए।” कहकर युवक मुसकराया।
“ओह! आप। माफ कीजिएगा, मैं पहचान नहीं पाया, पर अब समझ गया हूं। स्वागत है आपका।” कहते हुए मास्टरजी ने युवक को गले लगा लिया।
“अरे सुनो। अपने एक साथी पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी जी आए हैं। उनका भी खाना बना लेना।” मास्टरजी ने आवाज लगाई, तो युवक मुसकराया। यह मुसकान नए नाम को पाने पर थी।
अगली सुबह पंडित हरिशंकर को लेकर मास्टरजी ग्राम धिमारपुरा गए। वहां के एक विद्यालय में जाकर बोले, “यहां से अपना नया जीवन शुरू कीजिए।”
“अपना पुराना जीवन कैसे भूला सकता हूं?” कहते हुए युवक जिसे नया नाम मिला था, मुसकराया।
“पंडित जी, जब तक ब्रिटिश शासकों की आंखों में धूल झोंकने का मन हो, आप यहां रहें। नई पीढ़ी को राह दिखाते हुए देशभक्त बनाएं। आप जब अपने पुराने रूप में जाना चाहेंगे, आपको मैं क्या, शायद ईश्वर भी न रोक सकेगा।” मास्टरजी आत्मीयता से बोले।
इस तरह पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। वह रोज विद्यालय जाते। देश की नई पौध को पढ़ाते। उनके मन में देशभक्ति का भाव भरते। पर उनका अपना मन बेचैन रहता। कुछ कमी महसूस होती। वह शांति के बदले में ईंट का जवाब पत्थर से देने में यकीन रखते थे। उन्हें मालूम था कि कांग्रेस में भी कई लोग ऐसे हैं जो उनके तरीके को बुरा नहीं मानते, पर उनकी चलती नहीं थी। इसीलिए कुछ नया पाने की तलाश में वह यहां आ पहुंचे थे।
“छोड़ो। मैं भी क्या सोचने लगा? सबका जीवन जीने का ढंग अलग होता है। किसी को क्या दोष दूं?” सोचते हुए पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी कई बार कुछ दूर ओरछा के जंगल की ओर निकल जाते। वहां कोई नहीं जाता था। वहां वह पेड़ों पर निशानेबाजी का अभ्यास करते। निशाना बहुत अच्छा था, पर इस अज्ञातवास के दौरान जंग न लग जाए, यह भय उन्हें सताता रहता था।
एक दिन घूमते-घामते पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी एक मोटर गराज पर पहुंचे। गराज वाला नए मास्टरजी को पहचानता था। “एक मास्टर भला मोटर गराज में? ?” सोचते हुए उसने  पंडितजी का स्वागत किया। 
“सुनो।” पंडित जी कुछ सोचते हुए बोले।
“जी मास्टरजी हुक्म कीजिए।” गराज का मालिक हाथ जोड़कर बोला।
“क्या मुझे मोटर चलाना सिखा सकते हो?”
“मास्टरजी, आप मोटर चलाना सीखेंगे?” सुनकर अचरज में पड़ा गराज मालिक अवाक सा बोला।
“हां भाई। देश में विदेशी हुकूमत है। क्या पता, कब कौन सी विद्या की जरूरत आन पड़े, इस देश को आजाद कराने के लिए।” कहते हुए पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी कहीं खो से गए।
सुनकर भी कुछ न समझ सका बेचारा गैराज मालिक। वह मास्टरजी की इच्छा कैसे न पूरी करता?  उसने मास्टरजी को मोटर हांकना सिखाने के लिए हामी भर ली। इस तरह पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के तरकश में एक नया तीर और शामिल हो गया। सच में आन-बान-शान को बनाए रखने के लिए क्या पता कब किस विद्या की जरूरत पड़ जाए।
ऐसे ही कुछ समय बीता। पंडितजी के कुछ मित्र भी वहां आ जुटे थे। कुछ नए मित्र भी बने। फुर्सत के क्षणों में वह अपने मित्रों को भी बंदूक चलाना सिखाते। 
पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी ने सतारा नदी के तट पर एक हनुमान मंदिर की स्थापना की। वह वहीं रहते। पर कब तक? पिछला जीवन पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी को बुला रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन की गरमाहट बढ़ती जा रही थी। ऐसे में वह कब तक सुख की रजाई में मुंख छिपाकर जीते रहते? आखिर उन्होंने अपने कर्मस्थली की ओर रुख किया। देश के लिए बलिदान होना उनके भाग्य में लिखा था। इस लिखे को पूरा करने के लिए ही वह वापस लौटे थे।
और 27 फरवरी 1931 का दिन। पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी अपने असली रूप में आ चुके थे। साथियों के साथ इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में मंत्रणा चल रही थी। पर किसी अपने ने धोखा दे दिया और पुलिस सुराग पाकर पार्क में पहुंच गई। पार्क को चारों तरफ से घेर लिया गया। खूब गोलियां चलीं। पंडित जी का अभ्यास काम आया। उनके निशाने पर जो आया, वह प्राण से गया। पुलिस को व्यस्त रखकर अपने साथियों को पार्क से निकलने का अवसर दिया। अंत में जब लगा कि पुलिस के हाथ आना निश्चित है, तब अपना निशाना खुद पर आजमाया। अचूक निशानेबाजी के लिए मशहूर पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी भला खुद अपने निशाने से कैसे बच सकते थे? 23 जुलाई 1906 को जन्म लेने वाले चंद्रशेखर तिवारी ने अपने नाम से तिवारी हटाकर आजाद शब्द जोड़ लिया था। इस तरह चंद्रशेखर आजाद ने अपने नाम का मान रखा और अंत तक आजाद रहे और जीवित रहते पुलिस के हाथ नहीं आए।
मध्यप्रदेश सरकार ने आजादी के बाद धिमारपुरा गांव का नाम बदलकर आजादपुरा रख दिया। आज अल्फ्रेड पार्क को इलाहाबाद ही नहीं, दुनिया भर में लोग चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जानते हैं। आज भी वहां वह पेड़ खड़ा है, जिसने देश की आजादी के लिए स्वयं की जान की परवाह न करने वाले युवक चंद्रशेखर आजाद को अकेले पुलिस दल से लोहा लेते हुए देखा था।

 

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Story for kids on freedom fighter Chandra Shekhar Azad
JOKE : प्लीज, दिल्ली को पंजाब की राजधानी बना दोजानें इंडोनेशिया का यह बेरंग गांव आखिर क्यों बन गया टूरिस्ट स्पॉट