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FILM REVIEW: एंटरटेनमेंट के साथ चाहिए सोशल मैसेज तो जरूर देखें 'टॉयलेट:एक प्रेम कथा'

Akshay Kumar, Bhumi Pednekar

एक्टर्स: अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सुधीर पांडे
डायरेक्टर: श्री नारायण सिंह
राइटर: सिद्धार्थ सिंह-गरिमा वहाल
म्यूजिक:विकी प्रसाद-मानस शिखर

2.5 स्टार

'अगर बीवी पास चाहिए, तो घर में संडास चाहिए!' और 'लोगों ने तो मोहब्बत के लिए ताजमहल तक बनवा दिए और हम एक शौचालय तक न बनवा सके!' जैसे चुटीले संवादों वाले ट्रेलर के जरिये फिल्म टॉयलेट एक प्रेमकथा की कहानी तो पहले ही हम और आप तक पहुंच चुकी थी। 'हंस मत पगली' जैसे गाने भी हम डाउनलोड कर ही चुके हैं। और अब सामने है पूरी की पूरी 2 घंटे 35 मिनट की फिल्म। तो भाई फिल्म देखकर हम यही कहेंगे कि उतना मजा नहीं आया जितने की उम्मीद ट्रेलर और गानों को देखकर जगी थी।

फिल्म शुरू होती है मांगलिक केशव (अक्षय कुमार) और मल्लिका (एक भैंस) की शादी के साथ। शादी के बाद केशव के बाबूजी (सुधीर पाण्डेय) घोषणा करते हैं कि केशव की भैंस के साथ शादी से उसकी कुंडली का आधा दोष तो दूर हो गया है पर बाकी आधे दोष को दूर करने के लिए उसकी शादी ऐसी लड़की से करवानी होगी जिसके हाथ में छह उंगलियां हों। इस अनोखी शर्त से परेशान केशव एक दिन अचानक टकराते हैं शहर की टॉपर जया (भूमि पेडनेकर) से और उन्हें दे बैठते हैं अपना दिल। पर शर्त का क्या करें, सो एक अनोखा जुगाड़ करते हैं और दोनों की शादी हो जाती है। घर आने के बाद जया को पता लगता है कि केशव के घर में शौचालय तो है ही नहीं। सुबह मोहल्ले की महिलाएं उसे 'लोटा पार्टी' का न्यौता देती हैं तो जया उनके साथ चली तो जाती है पर वह वहां खुले में शौच करने को लेकर वह सहज नहीं हो पाती और वापस लौट आती है। इस तरह दो प्यार करने वालों के बीच आ जाता है शौचालय। इसके बाद खुले में शौच की समस्या को लेकर क्या उठापटक होती है, अंत में किस तरह इन दोनों का दोबारा मिलन होता है, यही है इस फिल्म की कहानी।

सहज मनोरंजन करने वाले डायलॉग्स, शानदार सिनेमेटोग्राफी वाली इस फिल्म की शूटिंग मथुरा के कस्बों की ठेठ देसी लोकेशंस में हुई है जो इसे खूबसूरत बनाती है। अक्षय कुमार की कॉमिक टाइमिंग हमेशा की तरह जबर्दस्त है। 'दम लगाके हइशा' के बाद भूमि को मथुरा की तेजतर्रार लड़की के रूप में देखना दिलचस्प है। उनका आत्मविश्वास गजब का है और वह फिल्म में बेहद प्यारी और मासूम लगी हैं। इंडस्ट्री में नई होने के बावजूद फिल्म में वह कहीं से भी अक्षय से कम नहीं लगी हैं। सुधीर पाण्डेय का अभिनय भी प्रभावित करने वाला है। प्यार का पंचनामा वाले लिक्विड यानी दिव्येंदु शर्मा ने भी अक्षय के छोटे भाई की भूमिका पूरी रंगबाजी के साथ निभाई है। 

इतनी सारी खूबियों के बावजूद इस फिल्म में कई झोल हैं। फिल्म में ज्यादातर वही बातें बताई गई हैं जिन्हें हर कोई जानता है। फिल्म का 'प्रेम कथा' वाला एंगल 'टॉयलेट' वाले एंगल से ज्यादा प्रभावी बन पड़ा है। केशव अपनी पत्नी जया की टॉयलेट की मांग पूरी करने के लिए क्या-क्या जुगाड़ करता है, वह देखने लायक है।

फिल्म और बेहतर हो सकती थी, बशर्ते...
-शौच की समस्या से महिलाओं को होने वाली समस्याओं और इसके खतरों की गहराई में उतरा जाता
-कॉमेडी के पंच जरा और पैने होते
-कहानी का अंत एकदम वैसा ही न होता, जैसा दर्शक सोच रहा है।
-आयशा रजा जैसे उम्दा कलाकारों का रोल थोड़ा और बड़ा होता

इसके अलावा एक और काबिलेगौर बात यह है कि फिल्म के कुछ हिस्से सरकार की तारीफ में कसीदे गढ़ते नजर आते हैं। शौचालय की समस्या पर आधारित इस फिल्म में नोटबंदी की तारीफों के भी पुल बांधे गए हैं।

फिल्म के एक दृश्य में अक्षय कुमार बड़े गर्व से कहते हैं, 'सरकार ने मुझे शौचालय बनवाने के लिए पैसा दिया था पर मैंने उसे लौटा दिया। क्या हम अपना घर बनवाने के लिए सरकार से पैसे मांगते हैं? तो फिर शौचालय बनवाने के लिए सरकार से पैसे क्यों लें?' कुमार साहब, वैसे ही गरीबों को सरकारी योजनाओं का फायदा विरले ही मिल पाता है। आप ऐसा क्यों चाहते हैं कि वह यह मदद लेने में भी शर्म महसूस करें? बेहतर यही होता कि आप सिर्फ उन्हें खुले में शौच करने के लिए शर्म महसूस करवाते।

तो कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि टॉयलेट एक प्रेमकथा देखने का मन बना रहे हैं तो 'प्रेमकथा' वाला एंगल देखने का मन बनाकर जाइएगा, 'टॉयलेट' वाला नहीं।

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  • Web Title: FILM REVIEW Toilet Ek Prem Katha: Akshay Kumar‬ ‪Bhumi Pednekar‬ starrer TEPK HITS CINEMAS
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