बुधवार, 03 सितम्बर, 2014 | 07:44 | IST
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नरेंद्र मोदी सरकार के सौ दिन किस कसौटी पर आंके जाएं? आंकड़ों के जंगल और आदेशों के अंबार तौले जाएं या राष्ट्रीय वातावरण एवं मजदूर-किसान और गृह-स्वामिनियों की आंखों में तैरते विश्वास को मापा जाए? आगे पढे
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान वहां की ‘बौद्धिक राजधानी’ क्योटो और भारत की सांस्कृतिक राजधानी- काशी (वाराणसी) के बीच ‘स्मार्ट सिटी’ करार युवा मन के साथ ही बड़े-बूढ़ों को भी उत्साहित और स्पंदित करता है। आगे पढे
 
कुछ बेतुकी बातें इतनी चल निकलती हैं कि वे सच्ची मानी जाने लगती हैं। स्वर्गीय शैलेंद्र गीत लिख गए- मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सिर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी। आगे पढे
 
‘मैं बहुत थक चुका हूं, अभी कुछ मत कहो।’ जैसे उनका तकिया कलाम हो। इसलिए उन्हें अब कोई कुछ कहता ही नहीं। लेकिन इससे खुश होने की बजाय वह दुखी रहने लगे हैं। आगे पढे
 
आज का दिन मेरे जीवन के सबसे सुखद दिनों में से एक है। इतिहास ने आज पुन: करवट ली है! विश्व जब ज्ञानार्जन के संस्थानों से अपरिचित था, उस समय मगध साम्राज्य में नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित था। आगे पढे
 
 
आम चुनाव के समय जब यह स्पष्ट हो गया कि देश की अगली सरकार भारतीय जनता पार्टी बनाने जा रही है, तब धुर-दक्षिणपंथी अर्थशास्त्रियों की राय थी कि सब्सिडी खत्म कर दी जाएगी। आगे पढे
 
स्लम बस्तियों के निवासियों को बेहतर आवासीय स्थिति देने के लिए अनेक योजनाएं आ चुकी हैं, पर स्पष्ट नीति के अभाव में इनसे अपेक्षित लाभ नहीं मिला है। आगे पढे
 
मानसून इन दिनों उखड़ा हुआ है। नहीं बरसा, तो हफ्तों तक नहीं बरसा, फिर एक दिन अचानक खूब सारा बरस गया। उसके बाद फिर सूखा। उधर, यादों की बारात में ट्विस्ट कर रही हैं फिल्मी बरसातें। आगे पढे
 
टोमैटो फेस्टिवल चीन के शेनयांग में आयोजित टोमैटो फेस्टिवल के दौरान मस्ती करते लोग। इस टोमैटो फेस्टिवल में लगभग 300 लोगों ने हिस्सा लिया। चीन के शेनयांग में आयोजित टोमैटो फेस्टिवल के दौरान मस्ती करते लोग। इस टोमैटो फेस्टिवल में लगभग 300 लोगों ने हिस्सा लिया। अन्य फोटो
आजकल लोग बहुत बोलने लगे हैं, क्योंकि सारी शिक्षा बुद्धि और तर्क को विकसित करने की शिक्षा है। तर्क यानी निरंतर बहस और दलीलें, किसी प्रकार दूसरे से अपनी बात मनवाना। आगे पढे
 
रेलवे रिजर्वेशन सेंटर का यह सीन किसी सिनेमा हॉल जैसा है। लोगों की लंबी-लंबी कतारें। आगे बढ़ने के लिए शोर-शराबा। थोड़ा-बहुत धक्का-मुक्की भी। आगे पढे
 
पिछले 50 साल में शायद ही इतिहास का कोई ऐसा छात्र होगा, जिसने बिपिन चंद्रा द्वारा लिखी हुई किताबें न पढ़ी हों। आगे पढे
 
इस समय दुनिया भर में पहले विश्व-युद्ध की शताब्दी मनाई जा रही है। इस मौके पर चंपारण के किसान सत्याग्रह की याद आ रही है, जिसके सौ बरस 2017 में पूरे होंगे। आगे पढे
 
देश के हर दफ्तर में एक अंधेश्वर विराजमान है। वह जन्मांध नहीं है, बस उसके साथ एक सुखद दुर्घटना घटी थी। उसका चयन प्रथम श्रेणी की प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया। आगे पढे
 
रिश्ते-नाते का जिक्र आते ही हर इंसान को अपने किसी एक के होने का एहसास होता है, माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी। इन रिश्तों की कोई कीमत नहीं होती। क्या ये रिश्ते खरीदे या बेचे जा सकते हैं? आगे पढे
 
संविधान में राज्यपाल को अधिकार दिया गया है कि वह मुख्यमंत्री नियुक्त करे, यह तय करे कि राज्य सरकार को विधानसभा में बहुमत हासिल है या नहीं। आगे पढे
 
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