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मैं भारत का स्वतंत्रता दिवस क्यों नहीं मनाता

Tarek Fateh

अगस्त की 15 तारीख वह दिन है, जब भारत अपनी आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाएगा। 1947 में इसी दिन भारत विदेशी शासन के एक हजार साल के लंबे अंधेरे दौर से मुक्त हुआ था। स्थायी कब्जा जमाने और हिंदू जीवन शैली को नष्ट करने की नीयत से भारत पर पहला हमला 710 ईस्वी में अरबों ने किया था। उसके बाद अफगान आए, तुर्क आए और फिर मध्य से बर्बर कहलाने वाले लोग आए। इन सबने यहां के सभ्य व शांतिपूर्ण लोगों पर भयानक अत्याचार किए। इन हमलों के जो घाव हैं, उन्हें भारत आज भी जी रहा है, लेकिन इस पर फिर कभी।

16वीं सदी के बाद यूरोपीय लोग भारत में आने शुरू हुए। कहने को तो वे भारत व्यापार करने के नाम पर आए थे, लेकिन उन्होंने धरती के इस सबसे समृद्ध क्षेत्र को सबसे गरीब देश में बदल दिया। सबसे पहले यहां पुर्तगाली आए, उसके बाद डच आए, फिर फ्रेंच आए और सबके अंत में आया ब्रिटिश राज। जो लगभग दो सौ साल तक चला। और 70 साल पहले जो आजादी मिली, भारत को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। और इसके जो घाव उसे मिले, वे शायद हमेशा उसके साथ रहेंगे।

सात हजार साल पुरानी सभ्यता, जो पंजाब के मैदानों, सिंधु नदी के तटों और हिमालय की तराई में विकसित हुई, उसने इस आजादी की कीमत अपने दोनों हाथ कटवाकर अदा की। 710 ईस्वी में ‘हिंद’ को तबाह करने का जो इस्लामिक सिद्धांत ‘गजवा ए हिंद’ यानी भारत पर पैगंबर मुहम्मद के युद्ध के नाम पर शुरू हुआ था, उसके नतीजे में भारत ने उस सिंधु नदी को ही खो दिया, जिसकी वजह से इस मुल्क को अपना नाम हासिल हुआ था। इसी के साथ पाकिस्तान के इस्लामिक गणराज्य का निर्माण हुआ।

भारत के दोनों हाथ काटने का सिलसिला 16 अगस्त, 1946 को ही शुरू हो गया था। यानी दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के लगभग एक साल बाद ही। यह ऐसी लड़ाई थी, जिसने उस धर्मयुद्ध की यादें ताजा कर दी थीं, जब लाखों यहूदियों के सफाए की कोशिश की गई। उस दिन पाकिस्तान आंदोलन के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने जो आंदोलन शुरू किया था, उसकी वजह से उसे ‘डॉयरेक्ट एक्शन डे’ कहा गया था। इसका अंत कलकत्ता (अब कोलकाता) में हजारों हिंदुओं के कत्लेआम के रूप में हुआ था। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ब्लैकमेल करने के लिए था, ताकि वह विभाजन की मांग को स्वीकार ले।

उनका दावा था कि मुसलमान गैर-इस्लामी लोगों के शासन में नहीं रह सकते, खासतौर पर उन हिंदुओं के, जिन्हें वे ‘गंदा’ मानते थे। जिस तरह जिन्ना ने अपने ठगों को कलकत्ता की सड़कों पर उतारा और मौत का तांडव किया, बिना किसी दया के लोगों को मौत के घाट उतारा गया, हजारों लोग मारे गए, इस पर हिंदुओं की प्रतिक्रिया वही थी, जिसकी जिन्ना उम्मीद कर रहे थे। उन्हें वह मिल गया, जिसकी उन्होंने योजना बनाई थी। दंगों के ठीक एक दिन पहले जिन्ना ने एक प्रेस कांफ्रेंस की थी। इसकी रिपोर्टिंग कर रही अमेरिकी पत्रकार मार्गरेट ब्रुक व्हाइट ने इसके बारे में अपनी किताब हॉफवे टु फ्रीडम  में लिखा है। उनके अनुसार, वहां जिन्ना ने कहा था कि ‘हमें या तो विभाजित भारत मिलेगा या फिर तबाह भारत’।

जिन्ना का यह ब्लैकमेल जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी, दोनों पर ही काम कर गया। जब तक यह नरसंहार खत्म होता, लाहौर में बहुत कम हिंदू और सिख बचे। उस प्राचीन शहर में, जिसे उसका नाम भगवान राम के पुत्र लव से मिला था। मुसलमान जो भारत से पाकिस्तान गए, वे खुद अपनी इच्छा से वहां पहुंचे, लेकिन हिंदुओं और सिखों ने अपनी इच्छा से अपने घर नहीं छोड़े। कुछ लोगों को निशाना बनाकर मार दिया गया और कुछ का पीछा किया गया। यहूदियों के साथ जो हुआ, उसके दो साल बाद ही पूरी दुनिया ने कहा था, ‘अब कभी नहीं’। लेकिन उसी समय इस्लामिक गणराज्य में यही हिंदुओं और सिखों के साथ हो रहा था।

राजनीतिक रूप से यह कहना भले ही वाजिब न हो, लेकिन तथ्य हमारी आंखों में आंखें डालकर देख रहे हैं। 15 अगस्त को भारतीय-कनाडाई मुसलमान अपनी मातृभूमि के हाथ काट देने का जश्न नहीं मनाएंगे। बाकी मैं उन फसाना लिखने वालों पर छोड़ रहा हूं, जिनके हवाई किलों में झूठ सद्भावना के संकेत बनकर रहते हैं।

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  • Web Title: Why do not I celebrate Independence Day of India
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