class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आजाद भारत के ये जंगल

वह अवश्य कोई समझदार होगा, जिसने शहर की तुलना जंगल से की है। ऐसे भी जंगल अब बचे कहां हैं? वृक्षों के तस्करों ने उनका नगरीकरण कर दिया है। कइयों का तर्क है कि सृष्टि में नष्ट कुछ कहां होता है, जंगल का सिर्फ रूपांतरण हुआ है। तभी तो नगरवासियों ने पशुओं की हिंसक प्रवृत्तियों को अपनाकर इस विषय में वन-विशेषज्ञों को झूठा साबित कर दिया है। यदि किसी ने गोविंद मिश्र का अरण्य तंत्र  पढ़ा है, तो उसे तत्काल मानवीय पशुओं के प्रतिष्ठित क्लब में जाकर टेनिस खेलने का ध्यान आएगा।

दोपायों की खोल चढ़ाकर कहीं भेड़िए, तो कहीं पर रंगे सियार जनहित की दुहाई देते हुए बिचर रहे हैं। कुछ हाथी ऐसे शाकाहारी हैं कि घास-पत्ती पर गुजारा करते हैं, तो कुछ मांसाहारी, शिकार के गोश्त पर। भरे पेट शिकार की हिंसक हरकत जानवर की सिफत नहीं है। यह अनूठी प्रवृत्ति सिर्फ इंसानी स्वभाव की विशेषता है। वह रुपये खा नहीं सकता है, तो उसे जोड़ने के जुगाड़ में हर नियम कायदे को ताख पर रखता है। बदनाम कौओं के घोंसले में छल-कपट से पलकर ऐसी काली कोयलें सिर्फ नैतिकता और शुचिता के उपदेश कूकती हैं। प्रशंसक उनकी तारीफ के कसीदे काढ़ते हैं। भ्रष्टाचारी कैक्टस के बियाबान में सदाचार का वसंत सिर्फ इसकी कूक से ही आता है।’ यूं कैक्टस के बारे में अधिकतर एकमत हैं। विवाद कोयल के बसंत-दूत के अवतार को लेकर हैं।

सुनते हैं कि उत्तर आधुनिक संस्कृति के दौर में इंसान अपनी पहचान की तलाश में है। क्या यह खोज गुफा-कंदराओं के पाषाण-युग के दिनों को दोहराकर ही संभव है? अकारण हिंसा के विश्व-व्यापी हादसे तो इसी ओर इंगित करते हैं। नाते-रिश्ते, पारिवारिक संबंधों के बिरवे स्नेह के अभाव में दिनोंदिन मुरझा रहे हैं। कभी, इस संयुक्त परिवार के प्रादुर्भाव का तथ्य आज भूतनाथ की ऐयारी के किस्से कहानी सा लगता है। संतानों द्वारा मां-बाप का तिरस्कार और पति-पत्नी का एक-दूसरे पर प्रहार वर्तमान की वास्तविकता है। कलियुग में क्या हमें कल्कि का इंतजार है?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:These forests of Independent India
नाम में ही सब कुछ रखा हैमैया मोरी कबहुं बढ़ेगी चोटी