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हिमालय के शिखर पर नया खेल

जोरावर दौलत सिंह

हिमालय सीमा पर एक और गतिरोध कुछ लोगों को चौंका गया। 2010 से अब तक चीन के लगभग 2500 ‘अपराध’ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दर्ज हुए हैं। मगर  इसे बहुत खास गतिरोध नहीं मानना चाहिए। यहां विवाद के मुद्दे या क्षेत्र का भारत-चीन क्षेत्रीय विवाद से सीधा मतलब नहीं है। दरअसल, वर्तमान गतिरोध का क्षेत्र भारत-चीन-भूटान के उस तिराहा-जंक्शन के पास है, जिस पर चीन और भूटान, दोनों ही परस्पर अपनी दावेदारी करते रहते हैं। 

विदेश मंत्रालय की 30 जून की विज्ञप्ति के अनुसार मामले में भारतीय संलिप्तता का मकसद उसके निकट सहयोगी भूटान की दावेदारी वाले भूभाग पर चीन को सड़क-निर्माण कर यथास्थिति बदलने से रोकना था। सहयोगी के हितों और अधिकारों की रक्षा कर भारत ने थिम्पू-दिल्ली रिश्तों को तो महत्व दिया ही, यह भी स्पष्ट इशारा कर दिया कि वह समूचे सिक्किम क्षेत्र में अपने पारंपरिक सामरिक हितों की रक्षा करना जानता है। बीजिंग के ऐसे इरादों को उप-महाद्वीप में वर्चस्व दिखाने के लिए चीन द्वारा आमतौर पर की जाने वाली बदमाशी के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जिसके जरिए वह उस इलाके में अपना दखल जताना चाहता है, जहां भारत का पारंपरिक रूप से बड़ा आधार है। दरअसल, पूर्व की घटनाओं की अपेक्षा इस बार का संकट ‘दांव पर किसका, क्या लगा है’ स्पष्ट न होने के कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। चीन के लिए इसका मतलब अगर ‘क्षेत्रीय संप्रभुता’ है, तो भारत के लिए चंबा घाटी में चीन की गहरी पैठ के कारण ‘सुरक्षा पर प्रभाव’ से जुड़ा हुआ है। 

इस मामले में दो तरह की राय है। एक के अनुसार हिमालय क्षेत्र का अनसुलझा विवाद और भविष्य में सुरक्षा को लेकर असमंजस की स्थिति इसका बड़ा कारण है। दूसरे की नजर में व्यापक भू-राजनीति और खतरे की आशंकाओं ने इस इलाके को प्रतिस्पद्र्धा का बड़ा मैदान बना दिया है। भारत-चीन के बीच संबंधों की गतिशीलता के लिहाज से तो आदर्श स्थिति यही होती कि दोनों की प्रबंधन रणनीति इसमें भूमिका निभाती,  लेकिन अविश्वास और मतभेद का स्तर जहां पहुंच चुका है, उसे देखते हुए लगता तो नहीं कि इसमें किसी की कोई दिलचस्पी है। 

सवाल है कि अब रास्ता क्या है? चीनी सीमा रक्षकों के साथ आमने-सामने की स्थिति आने के बाद उत्पन्न गतिरोध से निकलने के तीन विकल्प हैं- एक पक्ष अपने पैर पीछे खींच ले। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग करें या फिर दोनों पक्ष कूटनीति का सहारा लेकर अपना चेहरा बचाने की कोशिश करें। संकट के बाद उत्पन्न बयानबाजी को देखते हुए पहली बात तो नामुमकिन लगती है। दूसरे पक्ष को खदेड़ना भी अव्यावहारिक है, क्योंकि इससे क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा। कुछ टिप्पणीकार चरम सामरिक विकल्पों या शर्तों के बारे में भी सोच रहे हैं, जो उनकी नजर में भारत को लाभ दे सकता है। फिलहाल अब बहुत कुछ भू-राजनीतिक स्थितियों और इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अंतरराष्ट्रीय हालात में अपनी स्थितियों का कैसा मूल्यांकन करते हैं।

चीन इस मोर्चे पर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त दिखता  है। अमेरिका और जापान जैसे पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों  के साथ उसके संबंधों में स्थिरता दिखाई दे रही है। वाशिंगटन को लेकर आज भले ही मत-विभाजन की स्थिति हो, लेकिन चीन के साथ उसके संबंधों में एक नया आकर्षण दिखाई दिया है। पूर्वोत्तर एशिया में परस्पर सघन आर्थिक निर्भरता और सुरक्षा को लेकर नई सोच के बीच यह लगने लगा है कि चीन-अमेरिका संबंध अपनी जटिल स्थिरता बनाए रखेंगे। जी 20 सम्मेलन में शिंजो अबे के साथ शी जिनपिंग की मुलाकात भी उसके लिए बेहतर रही। माना जाता है कि शिंजो अबे ने चीन के ‘वन बेल्ट ऐंड वन रोड’ की पहल पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। जापानी अधिकारियों ने भी महसूस किया कि शिंजो ने शी से मुलाकात को ‘अत्यंत दोस्ताना’ बना दिया था और बीजिंग ने भी जापान के प्रति ‘उच्च स्तर की सद्भावना’ का प्रदर्शन किया।

विडंबना यह है कि चीन अपनी बढ़ती ताकत और तेजी से बढ़ती अंतरराष्ट्रीय छवि के कारण भी वर्तमान संकट को आगे नहीं बढ़ाना चाहेगा। वह जानता है कि हिमालय की सीमा पर टकराव उसकी छवि के लिए तो घातक होगा ही, ‘वन बेल्ट ऐंड वन रोड’ मामले में भी यह वैश्विक स्तर पर उचित नहीं होगा। इससे भारत में चीन विरोधी भावनाएं भड़केंगी, जिसका लाभ निश्चित तौर पर वाशिंगटन और टोक्यो उठाएंगे। यहां तक कि उप-क्षेत्रीय स्तर पर भी यह संघर्ष चीन को एक अविश्वसनीय साथी पाकिस्तान के साथ खड़ा होने को मजबूर कर देगा, जो उप-महाद्वीप में मजबूत व व्यापक सरोकार वाला प्रोफाइल पसंद करने वाले चीन के लिए घाटे का सौदा होगा।

दिल्ली के नजरिये से देखें, तो भारत की स्थिति को समझना बहुत आसान है। बहुत यकीन के साथ कहा जा सकता है कि भारतीय नीति नियंताओं ने भारत-अमेरिका संबंधों में छाई अनिश्चितता को बहुत सलीके से समझ लिया है और ये संबंध अब स्थिर ही नहीं, विकासमान भी हैं। हिंद महासागर में जापानी और अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति भी महाद्वीपीय गतिरोध की पृष्ठभूमि में दिल्ली को मनोवैज्ञानिक राहत देने वाली है। 

फिलहाल हालात समान रूप से जटिल हैं। कश्मीर में पाकिस्तान के असंतुलित और निरंतर छाया युद्ध को देखते हुए चीन के साथ बदले हालात दशकों के बाद दो मोर्चों पर मोर्चेबंदी वाला दौर वापस लाएंगे। दूसरी ओर बाकी पड़ोस एक स्थिर भारत-चीन समीकरण देखना चाहेगा। भारत के हर पड़ोसी ने विदेश मामले में दोहरी नीति अपना रखी है। वे भारत के साथ विशेष या मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते हैं, तो चीन से भू-आर्थिक संबंधों के लोभ में बंधे हैं। ऐसे में, भारत-चीन संघर्ष इस त्रिकोणीय गतिशीलता में बाधक बनेगा और उन्हें उन विकल्पों की ओर धकेलेगा, जो उनके अनुकूल नहीं होंगे। जाहिर है, इस उप-महाद्वीपीय हकीकत को भारत या चीन की इच्छा के हवाले नहीं किया जा सकता।

यह स्पष्ट समझना होगा कि इस क्षेत्र में सशस्त्र संघर्ष दोनों देशों के लिए ही अनुकूल नहीं होगा। दोनों का नुकसान तो है ही, यह एक नए शीतयुद्ध को जन्म देगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली और बीजिंग, दोनों इस मामले में संयम के महत्व को समझेंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:New game on Himalayas peak
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