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क्या यह इबारत पढ़ेगा पाकिस्तान

Vibhuti Narain Rai

‘दुनिया में मुंह दिखाने के लिए हमें अपना घर ठीक करना होगा’, ब्रिक्स द्वारा जारी घोषणापत्र पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ की एक टीवी चैनल को दी गई पहली प्रतिक्रिया पर उनको करीब से जानने वालों को आश्चर्य नहीं हुआ होगा। एक तो सेना के बारे में मुंहफट बयान देने के लिए मशहूर ख्वाजा आसिफ से ऐसी उम्मीद की जा सकती थी, दूसरे इसमें नागरिक नेतृत्व की वह पीड़ा छिपी हुई थी, जो सेना के सामने उसकी असहायता को समय-समय पर अभिव्यक्त करती रहती है। 


पाकिस्तान सरकार और सेना के लिए ब्रिक्स के बयान का इससे बुरा वक्त नहीं हो सकता। अभी पिछले ही पखवाड़े अमेरिकी राष्ट्रपति टं्रप ने पाकिस्तान व अफगानिस्तान को लेकर अपनी नीति घोषित की थी। यह 1980 के दशक से चली आ रही अमेरिकी नीतियों से काफी भिन्न थी। पहली बार अमेरिका ने न सिर्फ पाकिस्तान से तालिबान व हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ और कठोर कार्रवाई करने की मांग की, बल्कि स्पष्ट रूप से कहा भी कि अफगानिस्तान में स्थिरता और अमेरिका के दुश्मन ये संगठन पाकिस्तान में ही पनाह पाए हुए हैं। पहली बार अमेरिका ने अफगानिस्तान में भारत की वैध भूमिका को रेखांकित भी किया। पिछले डेढ़ दशक से अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई में निर्णायक जीत से कोसों दूर उसका धैर्य चुकता जा रहा है। उसे लग रहा है कि बिना पाकिस्तानी सहयोग के वह नहीं जीत सकता। वांछित कार्रवाई न करने पर पाकिस्तान को दी जाने वाली सारी सैनिक सहायता व कर्जों को रोकने की धमकी बदली हुई नीति का अंग है। 

अमेरिकी नीति में हुए बदलाव से तिलमिलाए पाकिस्तान के सैनिक और असैनिक नेतृत्व ने 1980 के बाद पहली बार अमेरिका के सामने तनकर खड़े होने की कोशिश की। पाकिस्तानी विदेश मंत्री की पूर्व निर्धारित वाशिंगटन और कई अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों की इस्लामाबाद यात्रा स्थगित कर दी गई। पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों ने एकजुट होकर अमेरिकी नीति का विरोध किया और तय किया कि अमेरिका जाने के पहले ख्वाजा आसिफ चीन, रूस व तुर्की जाएं और उनको समझाने की कोशिश करें कि आतंकवाद विरोधी लड़ाई में इस्लामाबाद भी पूरी तरह से लगा हुआ है और उसकी कुर्बानियों को भी वैश्विक मान्यता मिलनी चाहिए। ऐसे समय में ब्रिक्स का यह घोषणापत्र पाकिस्तान के लिए किसी कुठाराघात से कम न था। आखिर ब्रिक्स में चीन जैसा पुराना मित्र और रूस, जिससे पाकिस्तान को अफगानिस्तान के मसले पर हाल में कुछ हद तक समर्थन हासिल हुआ है, भी थे। ब्रिक्स घोषणापत्र में पहली बार पाकिस्तान में पली-बढ़ी तंजीमों जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा व हक्कानी नेटवर्क का जिक्र है। यदि चीन व रूस भी इन संगठनों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरनाक समझते हैं, तो अमेरिका और उनकी नीतियों में फर्क कहां है? फिर कोढ़ में खाज यह कि ब्रिक्स का सम्मेलन चीन में हो रहा था। गोवा के पिछले सम्मेलन में भारत चाहकर भी पाकिस्तानी संगठनों का उल्लेख नहीं करा पाया था। ऐसे में, पाकिस्तानी विदेश मंत्री उन्हें क्या समझाने जाते?

इस पूरे मसले में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि भारत, अफगानिस्तान के खिलाफ नीतियां पाक सेना बनाती है और आलोचना होने पर दुनिया भर में इनके बचाव के लिए असैनिक नेतृत्व को उतरना पड़ता है। ख्वाजा आसिफ की पहली प्रतिक्रिया में जो खीज छिपी है, उसे इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। यह एक आम जानकारी है कि जिन जेहादी तंजीमों की बात अमेरिका या ब्रिक्स कर रहे हैं, वे पाकिस्तानी फौज की ही निर्मिति हैं और वह इन्हें अपनी रणनीतिक पूंजी समझती है। असैनिक नेतृत्व चाहकर भी इनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाता और समय-समय पर उसकी झुंझलाहट प्रकट होती रहती है। कुछ महीनों पहले दैनिक डॉन में एक खबर लीक हुई थी, जिसके अनुसार प्रधानमंत्री आवास पर आयोजित एक सुरक्षा समीक्षा में मंत्रियों और नौकरशाहों ने इन तंजीमों को लेकर सेना को खरी-खोटी सुनाई थी। यह अलग बात है कि तंजीमों का तो कुछ बना-बिगड़ा नहीं, अलबत्ता खबर लीक कराने के आरोप में कई मंत्रियों और अफसरों की छुट्टी जरूर हो गई। प्रधानमंत्री कार्यालय को भी सफाई देनी पड़ी कि लीक में कोई सच्चाई नहीं है। इस बार भी  ख्वाजा आसिफ के इंटरव्यू के दो दिन बाद ही सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान से ‘डु मोर’ या अधिक कुछ करने की बात कहना बेमानी है। उम्मीद के अनुसार, ख्वाजा साहब के स्वर भी इसके बाद बदल गए। वह पाकिस्तानी पक्ष समझाने के लिए अपनी विदेश यात्रा पर निकल पड़े हैं। 

बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों और विश्व भर में नॉन स्टेट खिलाड़ियों द्वारा चलाए जा रहे आतंकवाद के खिलाफ बढ़ रहे गुस्से से पाकिस्तान का पक्ष कमजोर पड़ता जा रहा है। जिस अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत रूस के खिलाफ उसकी सरजमीन पर जेहादियों को खड़ा किया था, वही अब उससे दूसरी तरह पेश आ रहा है। पिछले ही दिनों पाकिस्तान के सबसे बड़े निजी बैंक हबीब बैंक लिमिटेड को इसकी बानगी मिल गई। 1978 से न्यूयॉर्क में चल रही इसकी गतिविधियां अगले कुछ दिनों में बंद हो जाएंगी। आरोप है कि इसने बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग की है। कई संदिग्ध खातों से पैसा सऊदी अरब और पाकिस्तान भेजा या मंगाया गया है। शक है कि इस लेन-देन में जेहादी तंजीमें शामिल हैं। एक पाकिस्तानी चैनल ने तो यहां तक कहा कि हबीब बैंक से अल रजी बैंक, सऊदी अरब भेजा गया कुछ धन पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की अवैध कमाई है। अमेरिकी अधिकारियों ने पहले तो हबीब बैंक पर 629 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया, पर बाद में अदालत से बाहर हुए समझौते में इसे घटाकर 225 मिलियन डॉलर कर दिया गया। जुर्माने की इस बड़ी रकम को चुकाने के बाद हबीब बैक को न्यूयॉर्क में अपना शटर भी गिराना पड़ रहा है। आतंकी संगठनों की रीढ़ उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता होती है। हबीब बैंक जैसी संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई उन्हें निर्णायक चोट पहुंचा सकती है।

ब्रिक्स का घोषणापत्र और अल हबीब बैंक के विरुद्ध कार्रवाई पर लिखी इबारत जैसी है। देखना यह है कि पाकिस्तान इसे पढ़ पाता है या नहीं? यह भी देखना दिलचस्प होगा कि कब तक उसकी सेना कहती रहेगी कि अब पाकिस्तान को नहीं, दुनिया को ‘डु मोर’ करना है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Hindustan Hindi opinion on 12 sept
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