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संपादकीय
नफरत और पागलपन एक-दूसरे के हमजोली होते हैं और अमेरिका में आजकल इन दोनों का ही तांडव दिख रहा है।
 
ब्लॉग - शशि शेखर
पानी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?
ये चुनाव एक अवसर थे, जीवन के लिए जरूरी इस तत्व पर सभी दल अपना एजेंडा पेश करते, लेकिन सिर्फ दलों के दलदल को और गंदा करने वाले नारे उछाले गए। पुरानी भारतीय कहावत है- ‘पानी पिला-पिलाकर मारा।’ हमारे नेता तो हमें बेपानी मार रहे हैं।
 
आप की राय
महाराष्ट्र में महानगरपालिका और जिला परिषदों के चुनाव में भाजपा का ंडंका बजा है। ये चुनावी नतीजे राज्य में भाजपा की ताकत बढ़ने के साफ संकेत हैं।
 
दिल्ली के रामजस कॉलेज में अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित ‘द कल्चर ऑफ प्रोटेस्ट’ सेमिनार में जेएनयू के विवादित वामपंथी छात्र नेता उमर खालिद को वक्ता के तौर पर बुलाए जाने को लेकर पिछले दो दिनों से घोर अराजक स्थिति बनी हुई है।
 
उत्तर प्रदेश की चुनावी रणभूमि में बयानबाजियों का महाभारत जोर पकड़ रहा है। राजनीति का ऐसा दंगल शायद ही कहीं देखा गया होगा कि प्रधानमंत्री हों या मुख्यमंत्री, सभी बढ़-चढ़कर एक-दूसरे पर बयानों के तीखे तीर चला रहे हैं।
 
रू-ब-रू
साल 1993 में मेरे साथ एक बड़ी घटना घटी। स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्मसभा में जाने की शताब्दी मनाई जा रही थी। वाशिंगटन में बड़े स्तर पर इससे जुड़े कार्यक्रम का आयोजन होना था।
 
मैं दीपावली के पांचों दिन हर कैदखाने में जाकर अपने ग्रुप के साथ कार्यक्रम करती थी। चूंकि वे कैदी अपने परिवार के साथ दीपावली का उत्सव नहीं मना सकते थे, इसलिए हम सब वहां जाकर उनमें आनंद के कुछ क्षण बांटते थे।
 
बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज तो कर दिया गया, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि फिलहाल मेरे घुटने, एड़ी, कोहनी और पांव के पंजे में मुड़ने की ताकत या लचक खत्म हो गई है। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि लचक धीरे-धीरे लौटेगी, लेकिन इसमें अच्छा-खासा वक्त लगेगा।
 
कॉलम
अगर आज कालिदास जी दिल्ली में रहते, तो दिल्ली के वसंत का वर्णन कैसे करते? इसे या तो संस्कृत के कवि बता सकते हैं या राधावल्लभ त्रिपाठी बता सकते हैं।
 
पिछले हफ्ते रूस ने राजधानी मॉस्को में छह देशों का एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसका मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान के भविष्य पर विचार करना था
 
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केन्या में रह रहे एक व्यक्ति को अपने नाबालिग पुत्र से मिलने की इजाजत दी और कहा कि हर बच्चे को मां और पिता, दोनों का प्यार पाने का बराबर का हक है।
 
कुछ शरारत और खुराफात करने के लिए उनका दिल मचल रहा था। अब वह बड़े हो गए हैं, यह सोचकर रुक गए। ‘हमारे भीतर एक बच्चा होता है।
 
जीने की राह
गुमनाम गांव से संसद तक का सफर
फावजिया का जन्म अफगानिस्तान के एक सियासी परिवार में हुआ। उनके पिता की सात पत्नियां थीं। परिवार में पहले से 18 बच्चे थे। मगर पिता संतुष्ट नहीं थे।
 
तबलची होने पर मिले ताने
एक दिन गुरुजी के संग रियाज कर रहा था। अचानक उन्होंने पूछा, यह कमरा इतना गंदा क्यों है? अगर तुम अपने बैठने की जगह साफ नहीं कर सकते, तो तुम कभी अच्छे तबला वादक नहीं बन सकते। जिंदगी के वे छोटे-छोटे सबक आज बहुत काम आते हैं।
 
अब जान भी जाए तो गम नहीं
किमबर्ले ब्रिटेन के ब्लैकबर्न शहर में पली-बढ़ीं। बाद में उनका परिवार मर्सीसाइड में रहने लगा। पिता फिल टेलर टीचर थे। बेटी को अंकों का खेल पसंद था, लिहाजा उन्होंने उसे गणित पढ़ने की सलाह दी। 12वीं पास करने के बाद वह लिवरपूल यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगीं।
 
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