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ग्रमीण अस्पतालों में अधिक दम तोड़ रही हैं बच्चियां

सूबे के ग्रामीण इलाकों में स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर जन्म लेने वाले बच्चों में लड़कियों की मौत अधिक हो रही है। मौत का कारण अस्पतालों में संसाधनों का कमी तो हैं ही साथ ही अभिभावकों में जागरूकता की कमी को भी माना गया है। राज्य में 1544 अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र पर गर्भवती महिलाओं के उपचार की सुविधा है लेकिन इनमें सिर्फ 434 पर ही प्रसव की व्यवस्था है। रविवार को वीरचंद पथ स्थित एक होटल में इंडियन एसोसिएशन ऑफ पेडियाट्रिक्स की ओर से आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में यूनिसेफ की ओर से यह जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने इसे राज्य के लिए गंभीर विषय बताया। साथ ही सुझाव दिया कि राज्य सरकार को नवजात बालिकाओं की मौत दर को कम करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। यूनिसेफ के डॉ. सैयद हुबे अली ने कहा कि पिछले तीन सालों से राज्य में शिशु मृत्यु दर स्थिर है। प्रति एक हजार जन्म लेने वाले बच्चों में 42 की मौत हो रही है। यह आंकड़ा नीचे नहीं आ रहा है। गत जनवरी से मार्च तक सूबे के 1222 प्रसव केंद्रों का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि दस प्रतिशत गर्भवती को सरकारी एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिली। गंभीर बच्चों के उपचार के लिए बनाए गए एसएनसीयू सेंटरों में जन्म के बाद 35 प्रतिशत लड़कियां और 65 प्रतिशत लड़कों को भर्ती कराया गया। इनमें 50 प्रतिशत लड़कियों और 36 प्रतिशत लड़कों ने दम तोड़ दिया। मौत के कारणों का अध्ययन किया गया तो पता चला कि अस्पतालों में संसाधन का अभाव, देर से उपचार, एक से दूसरे अस्पताल ले जाने में देरी, नीकू के संबंध में अभिभावकों की जानकारी न होना है। मरने वालों में सबसे अधिक गरीब तपके के परिवार के बच्चे थे। उन्होंने कहा कि शिवहर, बांका और पश्चिमी चंपारण को छोड़ शेष सभी जिले में एसएनसीयू स्थापित कर दिया गया है। डब्लूएचओ के डॉ. विशेष कुमार ने कहा कि बिहार में टीकाकारण 84 प्रतिशत तक पहुंच गया है लेकिन अब भी 14 प्रतिशत बच्चे टीकाकरण से दूर हैं। नीकू में भी हो जाता है संक्रमण डॉ. श्रवण कुमार, डॉ. सुधीर मिश्रा और डॉ. अश्विनी सूद ने कहा कि न्यू बर्न केयर यूनिट में भी बच्चों को संक्रमण हो जाता है। दस प्रतिशत ऐसे बच्चे होते हैं कि जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ऐसे बच्चों में संक्रमण का खतरा अधिक हो जाता है। डॉ. उत्पलकांत ने कहा कि वर्तमान समय में डेंगू का खतरा अधिक होता है। उन्होंने कहा कि बच्चों के जोड़ों में दर्द और बुखार हो तो डेंगू की जांच जरूरी करानी चाहिए। कार्यक्रम में डॉ. बृजमोहन, डॉ. आरके मिश्रा, डॉ. अशोक राय, डॉ. केएन मिश्रा, डॉ. एसबीपी सिंह, डॉ. विजय जैन, डॉ. ओमप्रकाश् आदि ने बच्चों में संक्रमण से संबंधित बीमारियों पर चर्चा की ।

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  • Web Title:Brief news
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