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श्राद्धपक्ष: श्राद्ध के दौरान समय, भोजन और व्यवहार के ये हैं नियम

इन दिनों श्राद्धपक्ष चल रहे हैं। अपने पितरों का आशीर्वाद लेने का यह सबसे उत्तम समय होता है। इस दौरान जो व्यक्ति अपने पितरों को श्राद्ध नहीं करता उसे जीवनभर कष्टों का सामना करना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह सबसे बड़ा दोष माना गया है, जो व्यक्ति श्राद्धक्रम ठीक प्रकार से नहीं करता उसे आर्थिक और शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। इस समय कुछ बातें ऐसी भी हैं जो व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए।

इन बातों का रखें ध्यान
-ब्रह्माजी ने पितरों को अपराह्नकाल दिया है। असमय में दिया गया अन्न पितरों तक नहीं पहुंचता है। सायंकाल में दिया हुआ कव्य राक्षस का भाग हो जाता है।

-पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए, पुत्र न हो तो पत्नी कर सकती है।

-श्राद्ध में पवित्रता का बहुत महत्व है, पितृकार्य में वाक्य और कार्य की शुद्धता बहुत जरूरी है और इसे बहुत सावधानी से करना चाहिए।

-श्राद्धकर्ता को क्रोध, कलह व जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

-श्राद्धकर्म करने वाले को पितृपक्ष में पूरे पन्द्रह दिन क्षौरकार्य (दाढ़ी-मूंछ बनाना, नाखून काटना) नहीं करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

-कोदो, चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, काला जीरा, टेंटी, कचनार, कैथ, खीरा, लौकी, पेठा, सरसों, काला नमक व कोई भी बासी, गला-सड़ा, कच्चा व अपवित्र फल और अन्न श्राद्ध में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

-श्राद्ध-कर्म में इन फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए- कदम्ब, केवड़ा, बेलपत्र, कनेर, मौलसिरी, लाल व काले रंग के पुष्प और तेज गंध वाले पुष्प। इन पुष्पों को देखकर पितरगण निराश होकर लौट जाते हैं।

-श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों को निमन्त्रण नहीं देना चाहिए। पितृकार्य में एक या तीन ब्राह्मण पर्याप्त होते हैं।

-श्राद्ध के लिए ऐसे ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए जो योगी, वैष्णव, वेद-पुरान का ज्ञाता, विद्या, शील व तीन पीढ़ी से ब्राह्मणकर्म करने वाला व शान्त स्वभाव का हो।

-श्राद्ध में केवल अपने मित्रों और गोत्र वालों को खिलाकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए।

-अंगहीन, रोगी, कोढ़ी, धूर्त, चोर, नास्तिक, ज्योतिषी, मूर्ख, नौकर, काना, लंगड़ा, जुआरी, अंधा, कुश्ती सिखाने वाले व मुर्दा जलाने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध-भोजन के लिए नहीं बुलाना चाहिए।

श्राद्ध में सात्विक अन्न-फलों का है महत्व
श्राद्ध में सात्विक अन्न-फलों को प्रयोग करने से पितरों को सबसे अधिक तृप्ति मिलती है। काला उड़द, तिल, जौ, सांवा चावल, गेहूँ, दूध, दूध के बने सभी पदार्थ, मधु, चीनी, कपूर, बेल, आंवला, अंगूर, कटहल, अनार, अखरोट, कसेरु, नारियल, तेन्द, खजूर, नारंगी, बेर, सुपारी, अदरक, जामुन, परवल, गुड़, मखाना, नीबू आदि अच्छे माने जाते हैं।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।
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