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पिछले आठ सालों में अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन के संस्थापक ओसामा बिन लादेन के मरने की खबर कम से कम छह बार तो आ ही चुकी है। सातवीं बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में लादेन के मरने की घोषणा कर डाली है। जहिर है लादेन जैसे आतंकवाद के बड़े कारोबारी के मरने की पुष्टि के लिए जितने सबूतों और वश्विक स्तर पर जिस तरह की पुष्टि की जरूरत है, वैसा कुछ नहीं हुआ है। न इस खबर को खारिज करने का अधिकारिक बयान कहीं से आया है और न ही अमेरिका और उसकी संस्थाओं से लेकर किसी आतंकी संगठन तक ने उस पर कुछ कहने की पहल की है। कहते हैं कि जरदारी एक बार पहले भी इस तरह का बयान दे चुके हैं और उसे तब भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। अब जबकि प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के आगे उनकी किसी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता तो इस बात को कैसे लिया जाएगा?
लादेन अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई की सूची में दुनिया के दस सबसे ज्यादा वांछित अपराधियों में हैं और उसके सिर पर पचास लाख डॉलर का इनाम है। पर ओसामा की यह तलाश कब तक पूरी होगी और वह इनाम क्या कभी किसी को मिलेगा, इस बारे में कुछ दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। लेकिन एक बात जरूर विश्वास के साथ कही जा सकती है कि सिर्फ ओसामा के मरने या मारे जाने से आतंकवाद नहीं खत्म होने वाला है। अफगानिस्तान में पहले रूस और फिर अमेरिका विरोधी युद्ध से लेकर न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए आतंकी हमले की कार्रवाइयों में ओसामा को जितना योगदान देना था, वह दे चुका है। वह एक व्यक्ति नहीं इस्लामी कट्टरपंथ, हिंसा और अमेरिका विरोध की एक परिघटना बन चुका है।
आतंकवाद न सिर्फ एक सोच है, बल्कि अपने आप में पूरा कारोबार है और इसी के बूते पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की बड़ी आबादी का जीवन चल रहा है। इसमें आतंकी ही नहीं सरकारें भी शामिल हैं। इस कारोबार का दूसरा पक्ष इसे खत्म करने के नाम पर फल फूल रहा है। इन सब के विज्ञापन के लिए आतंक संबंधी बयान दिए जाते हैं और खबरें चलाई जातीं हैं। इसीलिए जरदारी ने आतंक से युद्ध के नाम पर पश्चिमी देशों से और संसाधन की मांग की है। लेकिन आज ओसामा के व्यक्तिगत रूप से मरने से कहीं ज्यादा जरूरी है उस सोच और कारोबार का का मारा जाना, जिसे उसने चलाया था।

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