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नेपाल में धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक मोर्चे पर हारता माओवाद अब धर्म की राजनीति पर उतर आया है। पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों पर हमला कर यंग कम्युनिस्ट लीग के कार्यकर्ताओं ने अपना जनसमर्थन बढ़ाने के लिए भारत विरोधी नेपाली राष्ट्रवाद को जगाने की कोशिश की है। पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों की जगह नेपाली पुजारियों को नियुक्त करने का आदेश माओवादी प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने पिछले साल ही दिया था, लेकिन चौतरफा विरोध को देखते हुए उन्हें अपने फैसले को रोकना पड़ा था। यह मामला अदालत में लंबित भी है।
इसी नाते कर्नाटक के दो पुजारियों को वहां नियुक्त किया गया था। नेपाल में माओवाद की सबसे बड़ी सफलता राजशाही को समाप्त करने की रही है। उसके बाद वह हर मोर्च पर नाकाम हो रहा है। बहुमत की कमी के चलते उसे कई दलों की साझा सरकार चलाने का मौका मिला था, लेकिन वह उस मोर्चे पर विफल रहा। माओवादी छापामारों को सेना में शामिल करने का जो समझौता संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में हुआ था, वह लागू नहीं हो सका। वहां की सेना में इस बारे में जबरदस्त पूर्वाग्रह है, यह बात हाल में रिटायर हुए सेनाध्यक्ष आर. कटवाल ने अपने विदाई समारोह में दोहरायी है। इस बीच संविधान सभा के अध्यक्ष के चुनाव में भी माओवादी पराजित हुए हैं।
अब माओवादी इस तैयारी में हैं कि सन् 2010 मई तक संविधान सभा अपना काम न पूरा कर सके। माओवादियों ने पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों पर उस समय हमला किया है, जब यह मामला अदालत में लंबित है। यानी यह अदालत को प्रभावित करने का भी प्रयास है। यह सही है कि नेपाल की माओवादी राजनीतिक धारा से अच्छा राजनय कायम करने में भारत विफल रहा है, लेकिन उसी के साथ यह भी सही है कि माओवाद कभी चीन से निकटता बढ़ा कर तो कभी भारतीय पुजारियों और व्यापारियों पर हमले कर भारत विरोध की खेती करता रहा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारी रखने की तीन सौ साल पुरानी परंपरा कायम रहेगी या नहीं। सवाल यह है कि नेपाल के साथ हजारों साल पुराने जो धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्ते रहे हैं, उनका नए संदर्भ में क्या रूप रहेगा? किसी के इशारे पर साझी विरासत को तोड़ने का जख्म भारत-पाक भुगत रहे हैं। इसलिए नेपाल से बिगड़ते रिश्तों को संभालने के लिए सरकार और जनता सहित कई स्तरों पर सक्रियता बढ़ानी होगी।

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