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  Image Loading अन्य फोटो राष्ट्रपति ने तीसरा सप्तक के कवि कुंवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए 41वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया।
ज्ञानपीठ से नवाजे गए कुंवर नारायण
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:06-10-09 11:42 PM
Last Updated:07-10-09 01:28 AM
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राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने मंगलवार को कहा कि साहित्य का काम केवल मनोरंजन करना नहीं है बल्कि वह समाज का मार्गदर्शन भी करता है। इसमें हित की भावना निहित होती है और यह व्यक्ति को निराशा से आशा की ओर ले जाता है।

राष्ट्रपति ने तीसरा सप्तक के कवि कुंवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए 41वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करते हुए कहा कि श्रेष्ठ साहित्य वही है जो लोकप्रिय होता है, जो लोगों की भाषा में हो और उनके दिलों को छूता हो। इसके साथ ही बेहतर साहित्य लोगों को प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि इस वक्त देश को ऐसे श्रेष्ठ साहित्य की आवश्यकता है, जो भारतीय परंपरा से ओतप्रोत हो।

राष्ट्रपति ने कुंवर नारायण के साहित्य के बारे में कहा कि उनकी कृति आत्मजयी भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है और उनकी कति वाजश्रवा के बहाने तेज रफ्तार जिंदगी में पाठक को नई दृष्टि प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि पुरस्कृत कृतियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए ताकि यह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके। हालांकि, उन्होंने कहा कि कविता का अनुवाद मुश्किल होता है, इसलिए अनुवादक को कवि के मनोभावों को समझकर मूलकृति का अनुवाद करना चाहिए।

इस मौके पर कुंवर नारायण ने कहा कि वह पुरस्कारों को हमेशा एक सामाजिक ऋण मानते हैं, जिसे लेखन में सक्रिय रहकर चुकाना होता है। उन्होंने हमेशा अपने साधनों को साहित्य के हित में लगाने का प्रयत्न किया। उन्होंने कहा कि हिन्दी इस समय विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है। हिन्दी और अनेक भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य रचा जा रहा है। संसार की कई छोटी भाषाएं भी विश्वस्तरीय साहित्य दे रही हैं, जो अंग्रेजी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है। यह सुविधा भारतीय साहित्य को भी सहज उपलब्ध होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रामाणिक साहित्य और साहित्यकारों को लेकर अंग्रेजी मीडिया एवं संस्थानों को भी अधिक सचेत होना जरूरी है।

अपने लेखन के बारे में कुंवर नारायण ने कहा कि पंद्रहवी सदी में यूरोप में रेनसां और भारत में भक्ति आंदोलन चरम पर थे। दोनों ही साहित्य और कलाओं को आधुनिकता से जोड़ते हैं। बिना स्थायी जीवन मूल्यों के आधुनिकता भी अराजक और बेमानी हो सकती है। मैंने आधुनिकता को भारतीय दृष्टिकोण से देखा है। उन्होंने कहा, कविता मेरे मन की दुनिया है और उसे बहुत बड़ी रखना चाहता हूं जिसमें सबके सुख दुख के लिए पर्याप्त जगह हो। साहित्य मेरे लिए बुद्धि विलास नहीं जीवन का बहुत बड़ा यथार्थ है। इसे मैं ढाई आखर प्रेम के बल पर समद्ध और विकसित करना चाहता हूं।

राष्ट्रपति ने साहित्य के सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में कुंवर नारायण को सात लाख रुपये नकद, वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र, शाल और श्रीफल भेंट किया। हिन्दी साहित्यकारों में 1999 में निर्मल वर्मा के बाद 2005 में कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है। कुंवर नारायण की प्रमुख रचनाओं में चक्रव्यूह (1956), तीसरा सप्तक (1959), कोई दूसरा नहीं (1993), आत्मजयी (1965) वाजश्रवा के बहाने (2008) और कहानी संग्रह आकारों के आसपास (1971) शामिल है।

 
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